आधुनिक दिनचर्या में योग और आयुर्वेद शामिल होने चाहिये, बीएचयू में शुरू हुई एक पखवारे की कार्यशाला

वाराणसी। योग, आसन एवं प्राणायाम और आयुर्वेद सिर्फ चिकित्सा विज्ञान नही हैं बल्कि वैदिक ज्ञान-विज्ञान का प्रसार है। योग में प्रशिक्षक जनमानस को वही ज्ञान दे जिनका अभ्यास उन्होंने प्राप्त किया है इससे परीक्षित ज्ञान का ही संचार होगा। 21वीं सदी में दिनचर्या में योग तथा आयुर्वेद के तत्त्व शामिल होने चाहिये। बीएचयू के स्वस्थ्य वृत्त एवं योग विभाग तथा आयुर्वेद संकाय, कैवल्यधाम योग संस्थान लोनावाला (महाराष्ट्र) के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित योग एवं आयुर्वेद से स्वास्थ्य संवर्द्धन विषयक 15 दिवसीय कार्यशाला के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि रेक्टर प्रो0 वी0के0 शुक्ल ने यह विचाार व्यक्त किये। कैवल्यधाम योग संस्थान लोनावाला के प्राचार्य डा. शरद चन्द्र भालेकर ने कहा कि भारतीय शास्त्रीय ज्ञान की वैश्विक स्वीकार्यता नही है। अमेरिकी देशों में काफी हाउस की तरह टरमरिक (हल्दी) मिल्क शॉप खुले हुए हैं। इनका प्रयोग कैंसर से बचाव के लिये अपनाया जा रहा है। चूंकि आज भारतीय विज्ञान के वैश्विक प्रचार के साथ मूल सिद्धान्त से भटकाव की भी स्थिति बनी हुई है। अत: इस भटकाव को आयुर्वेद तथा योगविद्या मूल सिद्धान्तों के ज्ञान के प्रचार से रोका जा सकता है। अमेरिका ने शीर्षासन एवं सर्वाशसन पर रोक लगा दिया। वहां इसे योग डिफेक्ट्स कहा जाता है। यह प्रतिक्रिया योग के अति प्रयोग से उत्पन्न होती है। इस कार्यशाला का प्रमुख उद्देश्य भ्रांतियों को दूर कर जनजागरूकता लाना है। आयुर्वेद विभाग के संकाय प्रमुख प्रो. वीपी सिंह ने भी कार्यक्रम की विशिष्टता पर प्रकाश डाला।

वेद से मिल सकता है स्वस्थ जीवन

अध्यक्षीय उद्बोधन करते हुए प्रो. युगल किशोर मिश्र (शताब्दी पीठ आचार्य, भारत अध्ययन केन्द्र) ने कहा कि वेद के मन्त्रों में सबसे अधिक प्रार्थना आधि, व्याधिरहित मंगलकामना के लिए की गयी है। वेद के प्रत्येक स्वस्तिवाचन में ही अंग, प्रत्यंग सुदृढ़ एवं सन्तुष्ट करने की कामना की गयी है जिससे हम स्वस्थ जीवन प्राप्त कर सकते हैं। ईशावास्योपनिषद् की ह्यकुर्वन्नेवेह कार्माणिह्ण द्वारा सक्रिय जीवन का उद्देश्य वेदों में प्रतिपादित है। वेद में मूलत: चिकित्सा चार प्रकार की है। दैवविपाश्रय पूर्वजन्म के कारण होने वाली। आंगीरसी (रासायनिक मेडीसिनल केमिस्ट्री), मनुष्यजा (सर्जरी चिकित्सा), दैवी चिकित्सा (नेचुरोपैथी), आथर्वणी चिकित्सा (रत्न एवं मंत्र चिकित्सा)। प्राचीन भारत में आयुर्वेद में काय चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा दोनों विकसित थीं किन्तु ऐतिहासिक कालक्रम में शल्य चिकित्सा पर प्रतिबन्ध लग गया, इसलिए शल्य चिकित्सा का विकास रुक गया। भारतीय चिकित्सा की पूर्णता काय एवं शल्य चिकित्सा दोनों के द्वारा होती है। आशा है कि इन आने वाले दिनों में शल्य चिकित्सा का प्रयोग बढ़ाया जाएगा।

जीवन के महत्वपूर्ण प्रस्थान योग व आयुर्वेद

प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी, समन्वयक, भारत अध्ययन केन्द्र ने अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्पूर्ण कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत की। योग एवं आयुर्वेद भारत के प्राचीन विज्ञान हैं इनका महत्त्व इस बात से सिद्ध है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आज इसको प्रतिष्ठा प्राप्त है। योग एवं आयुर्वेद मानवीय जीवन के दो महत्त्वपूर्ण प्रस्थान हैं। इस अवसर पर भारत सरकार द्वारा 2019 के लिये संस्कृत क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान हेतु प्रो. युगल किशोर मिश्र को राष्ट्रपति पुरस्कार दिए जाने पर उनका अभिनन्दन किया। मुख्यातिथि प्रो. वीके शुक्ल ने प्रो मिश्र को सम्मानित किया।

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