रजनीकांत वशिष्ठ

चर्चा तो बहुत थी पर ये यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा था कि केसरिया बाने में लिपटा एक योगी देश के सबसे बड़े सूबे यूपी पर राज करेगा। वो भी तब जब यहां एक बटा पांच आबादी मुस्लिमों की हो। एक संन्यासिन उमा भारती देश के सबसे बड़े सूबे एम पी की नाकामयाब मुख्यमंत्री साबित हो चुकी हो और प्रचंड बहुमत से जीते सवा तीन सौ विधायकों के होते सोते मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए एक अदद सांसद को उधार लेने की नौबत आ जाए। उस पर तुर्रा ये कि यूपी के राज काज में मदद के लिए योगी को जो दो डिप्टी सी एम दिए गए वो भी जीते विधायकों में से न हों हालांकि ऐसा तो पहले भी हो चुका है। पर आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि कोई संन्यासी सी एम की कुर्सी पर विराजमान हुआ और वो भी दो दो डिप्टी सी एम के साथ। यूपी में यह भी पहली बार हुआ है

 

जब विजय पताका फहराने वाली पार्टी ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को मैदान में न उतारा हो

 

यह विचार का विषय है कि भाजपा के सवा तीन सौ विधायकों में से एक भी इस लायक क्यों नहीं समझा गया कि उसे सूबे की कमान सौंपी जा सके। शायद इसलिए कि इनमें से एक भी चेहरा भाजपा के नेतृत्व को ऐसा नहीं दिखाई दिया जो भाजपा को दो साल बाद ही होने वाले संसद के चुनाव में दोबारा दिल्ली की गद्दी पर बैठाने में सहायक सिद्ध हो पाए। पर अगर आज यूपी की कमान एक योगी के हाथों में है और दो चेहरे उसके सहायक हैं। तो इसलिए यह तिकड़ी भाजपा को 2024 तक दिल्ली के तख्त पर बिठाए रखने में कामयाब हो सकती है। गौरतलब है कि अखिलेश यादव का यूपी के विकास का नारा और मायावती की सोशल इंजीनियरिंग इस बार फेल हुई तो इसके मूल में वो प्रखर ध्रुवीकरण रहा जो कैराना, कसाब, कब्रिस्तान के जुमलों से हो गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी वक्तृता से इन जुमलों को गढ़ा और इन्हें गाढ़ा कर दिया योगी ने।

 

तो क्या फिर योगी की ताजपोशी का मकसद 2019 के लोकसभा चुनाव हैं ?

 

बेशक ! यूपी के शासक तय करते वक्त इस मकसद को ध्यान में रखा गया। दो दशकों से योगी भारत-नेपाल सीमा पर यही काम अपनी हिंदू युवा वाहिनी

के माध्यम से करते आ रहे हैं। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को पालने पोसने का जो काम सीमा पर अरसे से होता आ रहा था। उसे काउंटर करने का काम योगी ने पूरी शिद्दत से किया है। चाहे वो सीमा पर हिंदू यूवा वाहिनी की चैकियां बनाने का काम हो। चाहे गोरखपुर में मोहल्लों के नामों का हिंदवीकरण हो। या फिर इटावा में धर्मांतरण का अभियान हो। या लव जिहाद हो या तीन तलाक का मसला मुस्लिम तुष्टीकरण की कांग्रेस, सपा या बसपा की नीतियों पर जितना मुखर या प्रखर प्रहार योगी ने बीते सालों में किया है उतना किसी और भाजपाई ने नहीं किया। यह सब इस ताजा चुनाव में काम आया भी ऐसा प्रथम दृष्टया तो लग ही रहा है। फिर राम मंदिर निर्माण का सवाल भी तो है। जिसे अटल  सरकार इसलिए टाल गई कि गठबंधन राजनीति का तकाजा था। अब तो दिल्ली, लखनउ दोनों जगह राम मंदिर समर्थक सरकारें है। इसलिए योगी पर संतों का दबाव राम मंदिर निर्माण के लिए भी होगा।

 

अब आ जाइए डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा पर। बचपन में किताबों में जिस लखनउ को नवाबों की नगरी के बतौर पढ़ते सुनते आए थे। उस लखनउ के हिंदवीकरण का काम दिनेश शर्मा यहां का मेयर रहते हुए करते रहे है। एक बार उन्होंने मुझसे बातचीत में कहा भी, देखिए गोमती के किनारों का हिदवीकरण करवा रहा हूं। यह नवाबों की नगरी नहीं लक्ष्मण की नगरी है। इस प्रकार से दिनेश शर्मा भी एक ऐसा चेहरा हैं जो न केवल ध्रुवीकरण की आरएसएस की मंशा को सूट करते हैं बल्कि ब्राह्मण हैं और इस नाते प्रदेश के उन सवर्ण मतदाताओं की आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करते हंै जिन्होंने 2017 के विधानसभा चुनावों में झार कर कमल को वोट दिया है।

 

रही बात प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य की तो उनके डिप्टी सीएम बन जाने से उन गैर यादव पिछडे़ और गैर जाटव दलित मतदाताओं के कलेजे में ठंडक पहुंच सकती है जो इस बाद ध्रुवीकरण के चलते भाजपा शरणम गच्छामि हो लिए। 2019 तक इन मतदाताओं को साथ में ही जमाए रखने के इरादे से ही केशव प्रसाद मौर्य को उनकी कड़ी मेहनत का प्रसाद मिला है। केशव मौर्य भी जमीन से उठने वाले एक ऐसे नेता के रूप में उभरे हैं जिन्हें नजरंदाज कर पाना केन्द्रीय नेतृत्व के लिए आसान नहीं था।

 

अगड़े, पिछड़े और दलित अगर एक हो कर किसी राजनीतिक दल के साथ हो जाएं तो उस दल को सत्ता से हिला पाना किसी के लिए भी आसान नहीं

होगा। आजादी से पहले अंग्रेजों ने हिंदू और मुस्लिम को लड़ा कर हिदुस्तान पर राज किया था। ऐसा इसलिए किया क्योंकि तब सत्ता मूलतः मुगलों के ही हाथों में थी। आजादी के बाद आए राजनीतिक दलों ने अब तक हिदुओं को ही आपस में लड़ा कर अपना काम चलाया और मुसलमानों का तुष्टीकरण किया। मंडल के दौर में तो यह विभाजन क्रूर चरम पर पहंुच गया। अब बड़ी मुश्किल से सालों की मेेहनत के बाद आरएसएस और उसकी राजनीतिक शाखाओं जनसंघ और भाजपा ने सामाजिक समरसता का अभियान चला कर हिंदुओं को एक किया है। इस अभियान पर अब चुनावी मुहर लग चुकी है। बस इसे आगे भी कायम रखने की चुनौती है।

अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने चुनौती एक और भी है  और वो है राजधर्म निभाने की। यह चुनौती मोदी मंत्र सबका साथ सबका विकास के सहारे ही पूरी हो सकती है। मुख्यमंत्री होने के नाते अब यह योगी का पुनीत कर्तव्य होगा कि उनके राज में सभी को समभाव से देखा जाए। दुष्टों का बिना किसी भेदभाव के दलन किया जाए। सभी का कल्याण हो और भयमुक्त भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश बने। यह काम आसान नहीं होगा पर असंभव भी नहीं कहा जा सकता।

 

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