वाराणसी। सियासत अखाड़े में विरोधियों को मात देने के लिए सोशल साइट्स अब नया हथियार बन गया है। आलम ये है कि राजनीतिक पार्टियों को लेकर हर पल सोशल मीडिया पर नई अफवाह फैलाई जा रही है। खासतौर से बनारस में बीजेपी अफवाहों की सबसे ज्यादे शिकार हुई है। बीजेपी प्रत्याशियों को लेकर अफवाह का बाजार कुछ यूं है कि नामांकन के बाद भी टिकट को लेकर अफवाह उड़ाई जा रही है। चुनाव प्रचार की बजाय बीजेपी प्रत्याशी अफवाहों को लेकर अपने समर्थकों को सफाई देते फिर रहे हैं। अब सवाल है कि आखिर वो कौन है जो हर पल बीजेपी को लेकर शहर में तरह-तरह की अफवाहें उड़ा रहा ?  बीजेपी के रणनीतिकार इन अफवाहों की काट खोजने में नाकाम क्यों हो रहे हैं ? क्या दूसरी पार्टियों के मुकाबले बीजेपी की रणनीति पुख्ता नहीं है ? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो बीजेपी समर्थकों को परेशान कर रहे हैं।

नीलकंठ से लेकर सौरभ तक सब अफवाह से परेशान

मसलन शहर दक्षिणी सीट को ही लीजिए। बीजेपी ने इस सीट से वर्तमान विधायक दादा का टिकट काटकर युवा नेता नीलकंठ तिवारी को उम्मीदवार बनाया। पार्टी के इस फैसले के खिलाफ दादा ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। हालांकि उन्होंने कभी भी खुलकर बयानबाजी नहीं की लेकिन आलाकमान के सामने अपनी नाराजगी जरूर जाहिर की। अफवाह का दौर यहीं से शुरू होता है। दादा की नाराजगी को बीजेपी विरोधियों ने मुद्दा बना लिया और फिर सोशल साइट्स पर अफवाहें फैलानी शुरू कर दी। आलम ये था कि नीलकंठ तिवारी के नामांकन के आखिरी वक्त तक ये अफवाह फैलाई जा रही थी कि पार्टी का सिंबल नीलकंठ को नहीं बल्कि दादा को मिला है। यही नहीं दादा को कभी एमएलसी का ऑफर दिये जाने की खबर आई तो आलाकमान द्वारा राज्यपाल बनाने का प्रस्ताव तक की खबरें फैलाई जाने लगी। अफवाहों के शिकार सिर्फ दादा ही नहीं पार्टी के दूसरे उम्मीदवार भी हुए। शहर उत्तरी से रविंद्र जायसवाल भी कुछ दिन पहले तक अफवाहों को लेकर परेशान थें। शहर उत्तरी को लेकर ये अफवाह उड़ाई जा रही थी कि यहां से रविंद्र जायसवाल की जगह राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह को टिकट मिल सकता है। यही नहीं कैंट से प्रत्याशी सौरभ श्रीवास्तव भी अफवाहों से जूझते रहे। आलम ये है कि नामांकन के बाद भी उनके टिकट को लेकर कई तरह अफवाह उड़ाई जा रही थी।

क्या सोशल मीडिया पर पिछड़ रही है बीजेपी ?

आमतौर पर बीजेपी नेता सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादे सक्रिय रहते हैं, लेकिन विधानसभा चुनाव में प्रचार अभियान से धार गायब है। सोशल मीडिया में पार्टी की पकड़ को मजबूत करने के लिए बकायदा आईटी सेल का गठन भी किया गया है। बावजूद इसके बीजेपी दूसरी पार्टियों के मुकाबले पिछड़ती नजर आ रही है। यही नहीं जिस तरीके से विरोधियों ने सोशल मीडिया पर पार्टी को घेरा है उसकी काट अब तक बीजेपी के रणनीतिकार नहीं खोज पाए हैं।

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