वाराणसी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में उनकी पार्टी में ‘सब कुछ’ ठीक नहीं चल रहा है। टिकट बंटवारे के बाद बनारस के भाजपाई हत्थे से उखड़े हुए हैं। अब तो घोषित प्रत्याशियों का मुखर विरोध सिर्फ संगठन में ही नहीं, सड़कों पर भी दिखने लगा है। शुक्रवार को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्या, यूपी प्रभारी ओम माथुर और संगठन मंत्री सुनील बंसल को जिस तरह कार्यकर्ताओं के तीखे विरोध का सामना करना पड़ा, उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि काशी में इस बार का विधानसभा चुनाव भाजपा जैसी अनुशासित कही जाने वाली पार्टी के वर्करों के बागी तेवर के बीच होगा। ऐसे में कामयाबी कितनी मिलेगी, यह 11 मार्च को आने वाला परिणाम ही बताएगा। लेकिन फिलहाल जो हालात बने हुए हैं, उसे देख पार्टी का शीर्ष नेतृत्व समय रहते पहल नहीं करता तो, इसका रिजल्ट बेहद चौंकाने वाला हो सकता है। पार्टी को सिर्फ बनारस में ही बागी तेवर देखने को मिल रहे हैं, ऐसा नहीं है। बनारस के अलावा इलाहाबाद, गोरखपुर, बस्ती में भी भाजपा कार्यकर्ताओं के बागी सुर सुनने को मिल रहे हैं।
टिकट बंटवारे में संघ की ‘रणनीति’ 
पार्टी सूत्र मानते हैं कि इस बार भाजपा के टिकट बंटवारे में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका रही है और संघ के क्षेत्रीय समीकरण साधने के तहत ही प्रत्याशी मैदान में उतारे गये हैं। बिहार चुनाव में भी संघ ने यही काम किया था। वहां भी बीजेपी सत्ता में नहीं आ पायी लेकिन जदयू-कांग्रेस गठबंधन के बावजूद उसके वोट प्रतिशत में अच्छा-खासा इजाफा हुआ था। लेकिन यूपी चुनाव में उसका यह दांव चुनाव परिणाम आने से पहले ही पार्टी पर उल्टा पड़ रहा है। बनारस में टिकट बंटवारे में भी संघ की भूमिका अग्रणी रही।  इसी का नतीजा रहा कि पार्टी ने कहीं सीनियर लीडर का टिकट काट दिया तो कहीं परिवारवाद को बढ़ावा देते हुए टिकट दे दिया। माना जा रहा है कि दक्षिणी से घोषित भाजपा प्रत्याशी और संघ के एक पदाधिकारी देवरिया के रहने वाले हैं और उन्हें टिकट मिलने में इस फैक्टर का बड़ा रोल सामने आ रहा है।
संघ पदाधिकारी और प्रत्याशी के बीच ‘रिश्ता’ 
बनारस जिले की आठ विधानसभा सीटों में से तीन पर बीजेपी के विधायक काबिज हैं और सर्वाधिक बगावत भी इन्हीं तीन सीटों पर घोषित प्रत्याशियों को लेकर है। सबसे चौंकाने वाला नाम दक्षिणी विस सीट पर आया। जहां पार्टी ने कद्दावर नेता और सात बार से विधायक श्यामदेव राय चौधरी को दरकिनार कर इस बार सेंट्रल बार के पूर्व अध्यक्ष नीलकंठ तिवारी को अपना प्रत्याशी घोषित किया।संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले नीलकंठ देवरिया के मूल निवासी हैं और संघ के एक पदाधिकारी भी वहीं के रहने वाले हैं। चर्चा है कि नीलकंठ को टिकट दिलाने में संघ के उन्हीं पदाधिकारी की भूमिका रही है।
पार्टी आलाकमान को दादा की ‘दो टूक’ 
उधर, टिकट बंटवारे में उन्हें विश्वास में लिये बिना किसी दूसरे को टिकट दिये जाने से दादा काफी खफा हैं। वे इसे अपना अपमान मान रहे हैं। दूसरी ओर कैंट विधानसभा सीट पर पूर्व विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव के पुत्र सौरभ श्रीवास्तव को टिकट मिलने पर यहां के कार्यकर्ता मुखर विरोध में सामने आ गये हैं। शुक्रवार को बनारस आये प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या और प्रदेश प्रभारी ओम माथुर को बाबतपुर से लेकर शहर तक कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ा। दादा की नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें मनाने उनके घर गये इन प्रांतीय पदाधिकारियों से दादा ने पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा जताने के साथ अपनी व्यथा सुनाते हुए दो टूक कह दिया कि वे अपने अपमान के बाद इस चुनाव में पार्टी के लिए प्रचार नहीं करेंगे। वे पार्टी प्रत्याशी का विरोध भी नहीं करेंगे। दादा ने फैसला जनता पर छोड़ते हुए कहा कि जनता क्या करती है, इस पर मैं कुछ कह नहीं सकता। फिलहाल, दो दिन की मोहलत ले शीर्ष पदाधिकारी लखनऊ लौट गये।
परिवारवाद के आरोप से अपनों की ‘बगावत’ 
वहीं, कैंट सीट पर टिकट पाने के बाद पूर्व मंत्री हरिश्चंद्र श्रीवास्तव और विधायक ज्योत्सना श्रीवास्तव के बेटे सौरभ श्रीवास्तव का मुखर विरोध पार्टी वर्कर्स ही कर रहे हैं। उनका कहना है कि बीते 27 सालों से यहां की सीट एक ही परिवार के पास है और इस बार भी टिकट उसी परिवार में दे दिया गया। इससे दूसरे को मौका नहीं मिल पा रहा है। दूसरी ओर, उत्तरी में मौजूदा विधायक रविंद्र जायसवाल पर पार्टी ने एक बार फिर भरोसा जताते हुए टिकट दिया, जिनका विरोध इसी सीट से दावेदारी कर रहे सुजीत सिंह टीका कर रहे हैं। रविंद्र का टिकट कटवाने के लिए टीका दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं। काशी में पार्टी में बगावत के सुर सुनने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह भी काफी नाराज हैं। माना जा रहा है कि यदि जल्द टिकट बंटवारे की समस्या का समाधान नहीं निकलता है तो इस बार बनारस में पार्टी को इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है।

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