वैशाखी पूर्णिमा: सनातन धर्म के साथ बौद्धों के लिए खासा है महत्व, तथागत के जन्म से महानिर्वाण तक सभी महत्वपूर्ण पल इसी दिन

वाराणसी। हिन्दू धर्मशास्त्रों में लिखा है कि वैशाख के समान कोई मास नही है, सत्ययुग के समान कोई युग नही है, वेद के समान कोई शास्त्र नही है और गंगा जी के समान कोई तीर्थ नही है। वैशाख मास को ब्रह्मा जी ने सब मासों में उत्तम सिद्ध किया है। वह माता की भाँति सब जीवों को सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करने वाला है। धर्म, यज्ञ, क्रिया, तपस्या का सार है। सम्पूर्ण देवताओं द्वारा पूजित है। यही नहीं भारत के साथ दूसरे कई देशों में पूजे जाने वाले भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बुद्धत्व या संबोधि) और महापरिनिर्वाण ये तीनों एक ही दिन अर्थात वैशाखी पूर्णिमा के दिन ही हुए थे। ऐसा किसी अन्य महापुरुष के साथ आज तक नहीं हुआ है। जिसे बौद्ध लोग बुद्ध पूर्णिमा के नाम से मनाते हैं।

माना गया है सबसे उत्तम मास

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोधछात्र ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मन्त्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, धेनुओं में कामधेनु, देवताओं में विष्णु, प्रिय वस्तुओं में प्राण, नदियों में गंगा जी, तेजों में सूर्य उत्तम है, उसी प्रकार धर्म के साधनभूत महीनों में वैशाख मास सबसे उत्तम है। वैशाख मास में प्याऊ की स्थापना, भगवान शिव के ऊपर जलधारा की स्थापना, जूता-चप्पल-छाता, दान चिकना वस्त्र दान, चन्दन दान, शीतल जल का पूर्ण पात्र दान करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्ति होती है। जो वैशाख के पूरे दिन न कर पाया हो वो केवल ‘वैशाखी पूर्णिमा’ को कर दे तो सम्पूर्ण वैशाख मास का फल मिल जाता है।

पूजन की विधि और विधान

वैशाख में ‘वैशाखी पूर्णिमा’ बड़ी पवित्र तिथि है। इस दिन दान धर्मादि के अनेक कार्य किये जाते हैं जो इस वर्ष शनिवार 18 मई को पड़ रही है। इस दिन धर्मराज के निमित्त जलपूर्ण कलश और पकवान देने से गोदान के समान फल होता है। यदि पांच या सात ब्राह्मणों को शर्करासहित तिल दे तो सब पापों का क्षय हो जाता है। इस दिन शुद्ध भूमिपर तिल फैलाकर उसपर पूंछ और सींगों सहित काले मृग का चर्म बिछावे और उसे सब प्रकार से वस्त्रों सहित दान करे तो अनन्त फल होता है। यदि तिलों के जल से स्नान करके घी, चीनी, और तिलों से भरा हुआ पात्र विष्णु भगवान को निवेदन करे और उन्ही से अग्नि में आहुति दे अथवा तिल और शहद का दान करे, तिल के तेल के दीपक जलावे, जल और तिलों का तर्पण करे अथवा गंगादि में स्नान करे तो सब पापों से निवृत्ति होता है। यदि इस दिन एक समय भोजन करके पूर्णिमा, चन्द्रमा अथवा सत्यनारायण का व्रत करे तो सब प्रकार के सुख, सम्पदा और श्रेय की प्राप्ति होती है।

Related posts