भगवान विष्णु तथा शिव के ऐक्य का प्रतीक है ‘वैकुण्ठ चतुर्दशी’, सोमवार को इस तरह करें पूजन

वाराणसी। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी ‘नरक चतुर्दशी’ व शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी ‘वैकुण्ठ चतुर्दशी’ कहलाती है। नरक चतुर्दशी को नरक के अधिपति यमराज की और वैकुण्ठ चतुर्दशी को वैकुण्ठाधिपति भगवान श्रीविष्णु की पूजा की जाती है। यह तिथि अरुणोदय व्यापिनी ग्रहण करनी चाहिए जो इस वर्ष 11 नवम्बर 2019 को पड़ रही है। इसमें प्रात: काल स्नानादि से निवृत्त होकर दिनभर का व्रत करना चाहिए और रात्रि में भगवान विष्णु की कमल पुष्पों से पूजा करनी चाहिए। तत्पश्चात् भगवान शंकर की यथा विधि पूजा करनी चाहिये। रात बीत जाने पर दूसरे दिन शिव जी का पुन: पूजन कर ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भोजन करना चाहिए। वैकुण्ठ चतुर्दशी का यह पावन व्रत शैवों एवं वैष्णवों की पारस्परिक एकता और भगवान विष्णु तथा शिव के ऐक्य का प्रतीक है।

पूजन को लेकर यह है पौराणिक कथा

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोध छात्र ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक इसे लेकर एक कथा प्रसिद्ध है। एक बार भगवान् विष्णु देवाधिदेव महादेव का पूजन करने के लिए काशी आये। मणिकर्णिका घाटपर स्नान करके उन्होंने एक हजार स्वर्ण कमल पुष्पों से भगवान विश्वनाथ के पूजन का संकल्प लिया। अभिषेक के बाद जब वे पूजन करने लगे तो शिव जी ने उनकी भक्ति की परीक्षा के उद्देश्य से एक कमल पुष्प कम कर दिया। श्रीहरि को अपने संकल्प की पूर्ति के लिए एक हजार पुष्प चढ़ाने थे। एक पुष्प की कमी देखकर उन्होंने सोचा मेरी आंखे कमल के ही समान हैं, इसलिए मुझे ‘कमलनयन’ और ‘पुण्डरीकाक्ष’ कहा जाता है। एक कमल के स्थान पर मैं अपनी आँख ही चढ़ा देता हूँ- ऐसा सोचकर वे अपनी कमल सदृश आंख चढ़ाने को उद्यत हो गये। भगवान विष्णु की इस अगाध भक्ति से प्रसन्न हो देवाधिदेव महादेव प्रकट होकर बोले, हे विष्णु! तुम्हारे समान संसार में दूसरा कोई मेरा भक्त नहीं है, आज की यह कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी अब वैकुण्ठ चतुर्दशी के नाम से अभिहित होगी। इस दिन व्रतपूर्वक पहले आपका पूजन कर जो मेरा पूजन करेगा, उसे वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति होगी। भगवान् शिव ने विष्णु को करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान कान्तिमान सुदर्शन चक्र दिया और कहा कि यह राक्षसों का अंत करने वाला होगा। त्रैलोक्य में इसकी समता करने वाला कोई अस्त्र नहीं होगा।

बल, पौरुष और आरोग्य की वृद्धि हेतु करें ये कार्य

कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को स्नानादि के अनन्तर उपवास का संकल्प लेकर देवों को तोयाक्षतादि से और पितरों को तिलतोयादि से तृप्त करके कपिला गौ का गोमूत्र कृष्ण गौ का गोमय श्वेत गौ का दूध पीली गौ का दही और कबरी गाय का घी लेकर वस्त्र से छान करके एकत्र करें। उसमें थोड़ा कुशोदक(डाभ का पानी) भी मिला दे और रात्रि के समय उक्त पंचगव्य पीये तो उससे तत्काल ही सब पाप-ताप और रोग-दोष दूर होकर अद्भुत प्रकार से बल, पौरुष, और आरोग्य की वृद्धि होती है। देवीपुराण के अनुसार उसी चतुर्दशी को जौ के चूर्ण की चौकोर रोटी बनाकर गौरी की आराधना करें और उक्त रोटी का नैवेद्य अर्पण करके स्वयं उसका एक बार भोजन करे तो सुख-सम्पत्ति और सुन्दरता प्राप्त होती है।

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