रजनीकांत वशिष्ठ
यूपी में यादव वंश का राजकुमार अब राजकुमार नहीं रहा, खुद राजा हो गया है। अभी तक साढ़े चार सालों में यूपी के साढ़े चार मुख्यमंत्रियों में से आधे मुख्यमंत्री के विशेषण से दबे अखिलेश यादव अब अपने आप को पूरा मुख्यमंत्री कहलाने के लिये चुनावी मैदान में उतर पड़े हैं। बकौल डिम्पल यादव, वो अभी तक ट्रेनी चीफ मिनिस्टर थे फिर भी अच्छा काम कर गये। अब ट्रेन्ड चीफ मिनिस्टर के तौर से और भी अच्छे से विकास करेंगे।
मुलायम परिवार तीन महीने की पीड़ा से उबर चुका है। प्रदेश में समाजवादी विचारधारा के पर्याय और सुप्रीम ताकत मुलायम सिंह यादव चार दशकों से सियासत के अखाड़े में अपना पार्ट बखूबी अदा करते आये हैं। वो खुद 28 साल की उमर में सियासत में कदम रख चुके थे। समाजवादी पार्टी एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में कायांतरण की प्रतीक्षा में थी। मुलायम के पौरुख थकने लगे थे और उनके बेटे, भाई, भतीजे से लेकर पोते तक राजनीति में प्रवेश करने लगे हैं। इसलिये मुलायम की राजनीतिक विरासत पर दावे के लिये यादव वंश में वही सब कुछ हुआ जो पीछे हजार सालों से राजपरिवारों में होता आया है। ब्रज में कहावत है-घोंटू पेट की तरफ ही मुड़ता है। ऐसा त्रेता युग में ही हुआ होगा जब पिता के कहने पर राम ने राजसत्ता भाई को सौंपी थी। वरना कलयुग की राजनीति में तो भाई-भतीजे को सत्ता कौन सौंपना चाहेगा।
गौर फरमाइये चुनाव आयोग के फैसले के बाद के मुलायम सिंह यादव के उस बयान पर जिसमें उन्होंने कहा-चलो अच्छा हुआ, साइकिल बच गयी। इसका भावार्थ ये था कि उन्होंने जो राजनीतिक पूंजी संघर्षोंं से जमा की थी वो बेटे अखिलेश के हाथों में चली गयी। एक भाई शिवपाल दंत-नख विहीन हो गया और दूसरा भाई रामगोपाल बेटे का खैरख्वाह बन गया। रही बात अगली पीढ़ी की तो उसे अखिलेश संभाल लेंगे। नेहरू से इंदिरा, इंदिरा से संजय और फिर राजीव और राजीव से सोनिया और अब सोनिया से राहुल के मामले में भी ऐसा ही हुआ था और हो रहा है। तमिलनाडु में करुणानिधि, पंजाब में बादल, महाराष्ट्र में ठाकरे, उड़ीसा में पटनायक, कश्मीर में अब्दुल्ला और सईद परिवारों के उदाहरण सामने हैं। आंध्र प्रदेश एक अपवाद माना जा सकता है, जहां दामाद चन्द्रबाबू ससुर एनटीआर की विरासत पा गये। अब यूपी में कहानी ये है कि गांधी वंश और यादव वंश के चिराग साथ चल कर प्रदेश और देश का ठेका मोदी से छीनना चाहते हैं। दो युवाओं की यह जोड़ी मोदी के निजाम और काम करने के तौर तरीकों की मुखालफत करने निकल पड़ी है। अखिलेश अच्छा लड़का है यह राहुल गांधी कह ही चुके हैं तो अखिलेश को भी राहुल का साथ पसंद है।
हुआ वही जिसका अंदेशा चाचा शिवपाल यादव भरी सभा में जाहिर कर चुके थे कि भतीजा दूसरी पार्टी के साथ मिल कर सरकार बनाने की तैयारी कर चुका है। प्रदेश के तमाम सारे लोग ऐसे मिले जो ये कहते कि अखिलेश तो ठीक है और वो उसे राजनीतिक निष्ठा से परे जाकर वोट भी कर सकते हैं। पर चाचा यानी शिवपाल और अंकल अमर सिंह की चाल ढाल ठीक नहीं है। वो इसलिये कि अखिलेश ने विकास के कुछ काम तो किये हैं, चाहे मेट्रो हो या आगरा एक्सप्रेस-वे। लैपटाॅप वितरण हो या वृद्धावस्था पेंशन, अखिलेश की इमेज बिल्डिंग का काम प्रोफेशनल तरीके से ऐसे हुआ कि वो विकास पुरुष हैं और उनके साथ चिपके मुलायम या शिवपाल भक्त उनके रास्ते में रुकावट हैं। अब वो रुकावट दूर हो चुकी है और अखिलेश नये समाजवादियों के मुखिया हैं।
यहां तक तो ठीक है जैसा परिवार के बुजुर्ग ने चाहा वैसा हुआ पर अब पतवार नयी पीढ़ी के हाथों में है। अखिलेश को भी अब जनता को यह भरोसा दिलाना होगा कि अब तक भले ही वो ठीक से काम नहीं कर पाये। पर एक मौका और मिला तो राहुल के साथ मिल कर वो सूबे की  सूरत बदल देंगे। सपा के ताजा घोषणापत्र से तो उन्होंने ये जाहिर कर ही दिया है कि तमिलनाडु के रास्ते पर चल कर वो एक शंहशाह की तरह जनता को तोहफों से मालामाल कर देंगे। वो सब तो ठीक है पर अखिलेश के सामने जनता के सवाल भी हैं, कि क्यों उनके शासन में कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते रहे। क्यों अधिकांश विभागों में सरकारी भर्तियों में एक जाति विशेष का ही बोलबाला रहा। भर्ती छोड़ों क्योें नियुक्तियों में भी एक जाति विशेष हावी रही। महज राजधानी में ही मेट्रो या फिर आगरा एक्सप्रेस-वे में पैसा झोंकने से हुआ विकास क्या सौंदर्यमूलक विकास नही कहा जायेगा। यही पैसा गांवों या कस्बों में जाता, जैसा खुद मुलायम ने कहा था, तो क्या बेहतर समावेशी विकास नहीं होता।
खैर चुनाव काम से कम, प्रबंधन से ज्यादा जीता जाता है। इन तीन महीनों में जिस तरह सपा में उम्मीदवारों की सूची पर सूची जारी हुई हैं, उससे हर जिले या चुनाव क्षेत्रों में क्या भ्रम की स्थिति पैदा नहीं होगी। चाचा शिवपाल के जिन समर्थकों का टिकट कटा है या फिर वो साइडलाइन हुए हैं  क्या वे सब अखिलेश के अभियान को पंचर करने में कोई कसर छोड़ेंगे। बलिया में अंबिका चैधरी, इटावा में रघुराज सिंह शाक्य, बाराबंकी में बेनी प्रसाद वर्मा, गाजीपुर में अंसारी बंधु, सिकंदरामऊ में राकेश सिंह राणा और न जाने कितने नाम ऐसे हैं जो सपा उम्मीदवारों के लिये सिरदर्द साबित हो सकते हैं। साथ ही यह कहा जाता है कि मुलायम सिंह यादव की पूरी राजनीति कांग्रेस विरोध या उसे छकाने पर आधारित रही है। पर अखिलेश ने तात्कालिक लाभ के लिये बड़ी राजनीतिक पार्टी से जो हाथ मिलाया है उसका फायदा सपा को होगा या कांग्रेस को, इसका फैसला जनता करेगी। राजनीतिक पंडितों का कयास तो ये है कि कांग्रेस सालों के सूखे से उबर जायेगी पर सपा झेल जायेगी।
पूर्वांचल के अंसारी बंधुओं या अतीक अहमद को सपा ने ये कहकर अपने से अलग किया है कि अखिलेश राजनीति में अपराधीकरण के खिलाफ हैं। पर एक बार अफजाल अंसारी ने बातचीत में कहा था कि प्रदेश के नब्बे परसेंट मंत्री और विधायक अखिलेश के साथ है पर नब्बे परसेंट मुसलमान मुलायम के साथ हैं। अब अगर अंसारी बंधुओं के बसपा में जाने के बाद यह मुसलमान मतदाता अखिलेश से छिटक गया तों उनकी सत्ता में वापसी एक सपना ही रह जायेगी। बहरहाल अब समय भी कम है और अखिलेश को इन सारी आशंकाओं को खारिज करना होगा। यानी कुलमिलाकर स्थिति ये है कि यूपी में बहुत कठिन है डगर अखिलेश की वापसी की।

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