रक्षाबंधन को लेकर यह है पौराणिक कथाएं, ऋषि तपर्ण और श्रवण पूजा का भी है दिन

वाराणसी। भाई-बहन के त्योहाार के रूप में रक्षा बंधन की मान्यता है लेनिक इसे लेकर दूसरी पौराणिक कथाएं हैैं। पहली राखी को लेकर कथा यूं है कि एक बार देवता और दानवों में 12 वर्ष तक युद्ध हुआ पर देवता विजयी नहीं हुए। तब देवगुरू बृहस्पति जी ने सम्मति दी कि युद्ध रोक देना चाहिए। यह सुनकर इन्द्राणि ने कहा कि मै कल इन्द्र को रक्षा बाँधूंगी, उसके प्रभाव से इनकी रक्षा रहेगी और यह विजयी होंगे। श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को वैसा ही किया गया और इन्द्र के साथ संपूर्ण देवता विजयी हुए ।

दशरथ ने किया श्रवण पूजन का प्रचार

बीएचयू ज्योतिष विभाग के ज्योतिषाचार्य पंं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को नेत्रहीन माता पिता का एकमात्र पुत्र श्रवण (जो उनकी दिन रात सेवा करता था) एक बार रात्रि के समय जल लाने को गया। वहीं कहीं हिरण की ताक में अयोध्या के राजा दशरथ छुपे थे। उन्होंने जल के घड़े के शब्दको पशु का शब्द समझ कर बाण छोड़ दिया जिससे श्रवण की मृत्यु हो गई । यह सुनकर उसके माता-पिता बहुत दुखी हुए। तब दशरथ जी ने उनको आश्वासन दिया और अपने अज्ञान में किए हुए अपराध की क्षमा याचना करके श्रावणी को श्रवण पूजा का सर्वत्र प्रचार किया। उस दिन से संपूर्ण सनातनी श्रवण पूजा करते हैं और उक्त रक्षा सर्वप्रथम उसी को अर्पण करते हैं।

श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को होता है ऋषि तर्पण

यह भी श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को किया जाता है। इसमें ऋग, यजु, साम के स्वाध्यायी ब्राम्हण, क्षत्रिय और वैश्य जो ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, किसी आश्रम के हो अपने-अपने वेद कार्य और क्रिया के अनुकूल काल में इस कर्म को संपन्न करते हैं । उस दिन नदी आदि के तटवर्ती स्थान में जाकर यथा विधि स्नान करें। कुशा निर्मित ऋषियों की स्थापना करके उनका पूजन, तर्पण और विसर्जन करें और रक्षा पोटलिका बना कर उसका मार्जन करे। तदनंन्तर आगामी वर्ष का अध्ययन क्रम नियत करके सायं काल के समय व्रत की पूर्ति करें। इस में उपाकर्पमद्धति आदि के अनुसार अनेक कार्य होते हैं। विद्वानों से जानकर यह कर्म प्रतिवर्ष सोपवीती प्रत्येक द्विज को अवश्य करना चाहिए। यद्यपि उपाकर्म चातुर्मासमें किया जाता है और इन दिनों नदियां रजस्वला होती हैं। बावजूद इसके ‘उपकर्माणि चोत्सर्गे प्रेतस्नाने तथैव च, चन्द्रसूर्यग्रहे चैव रजोदोषो न विद्यते, इस वशिष्ठ वाक्य के अनुसार उपाकर्म में उसका दोष नही माना जाता।

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