महाशिवरात्रि पर ऐसे करें शिवजी की पूजा, जानिये पूजन विधि

वाराणसी। देवों के देव कहे जाने वाले महादेव को भोलेनाथ भी कहा जाता है। भक्तों की पूजा पर वह सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं और मनोवांछित वर प्रदान करते हैं। ऐसे में महाशिवरात्रि की पूजा उन्हें इस जन्म ही नहीं बल्कि अगले जन्म से भी मुक्ति मिल जाती है। व्रती को चाहिए कि प्रात:काल स्नानादि से निवृत्त होकर भाल में भस्म का त्रिपुण्ड तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला धारण करके दिनभर (शिव का स्मरण करता हुआ) मौन रहे। तत्पश्चात शाम के समय फिर स्नान करके शिव मंदिर में जाकर सुविधानुसार पूर्व या उत्तरमुख होकर बैठे।

रात्रि के चारो प्रहर है पूजा का विधान

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोधछात्र ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक तिलक तथा रुद्राक्ष धारण करके ऋतुकाल के गन्ध-पुष्पादि, बिल्वपत्र, धतूरे के फूल, घृतमिश्रित गुग्गुल की धूप, दीप, नैवेद्य, और नीराजनादि आवश्यक सामग्री समीप रखकर रात्रि के प्रथम प्रहर में पहली, द्वितीय में दूसरी, तृतीय में तीसरी और चतुर्थ में चौथी पूजा करें। चारों पूजन पंचोपचार, षोडशोपचार, राजोपचार- जिस विधि से बन सके समानरूप से करे और साथ में रूद्रपाठादि भी करते रहे। इस प्रकार करने से पाठ, पूजा, जागरण, और उपवास- सभी सम्पन्न हो सकते हैं। पूजा की समाप्ति में आरती, मन्त्रपुष्पाञ्जलि, और अर्घ्य परिक्रमा करें।

छोटी या बड़ी, सभी पूजा से समान भाव होते प्रसन्न

स्कन्दपुराण में कहा गया है कि महाशिवरात्रि का पूजन,जागरण, और उपवास करने वाला मनुष्य माता का दूध कभी नहीं पी सकता अर्थात उसका पुनर्जन्म नहीं हो सकता। शिवरात्रि के व्रत में कठिनाई तो इतनी है कि इसे वेदपाठी विद्वान ही यथाविधि सम्पन्न कर सकते हैं और सरलता इतनी है कि पठित-अपठित, धनी-निर्धन, सभी अपनी-अपनी सुविधा या सामर्थ्य के अनुसार हजारों रुपये लगा कर भारी समारोह अथवा मेहनत-मजदूरी से प्राप्त हुए कुछ रुपये के गाजर, बेर, और मूली आदि सर्वसुलभ फल-फूल आदि से पूजन कर सकते हैं। दयालु शिव जी छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी सभी पूजाओं से समान भाव से प्रसन्न होते हैं।

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