अलमस्ती और फक्कड़पन हमारा सिग्नेचर यूं ही नहीं है। जिंदगी को छोड़ कर पैसे-रूतबे के पीछे भागने वाले अक्सर ही नहीं हमेशा ही इसे हेय दृष्टि से देखते हैं। कहते हैं बनारसी बढ़ना नहीं चाहता, दुनिया से नज़रें मिलाना नहीं चाहता…उनको बोलिए आ के इस माहौल से दो-चार हो जाएं।

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एक तरफ कर्बला को जाते ताजिए तो दूसरी तरफ नाटीइमली का भरत मिलाप। दोनों में अपार भीड़, कहना मुश्किल कि कहां ज्यादा लोग हैं… लेकिन सब कुछ बहते पानी की तरह निकल गया। एक रात पहले भी देर तक दुर्गा प्रतिमाओं का विसर्जन चला लेकिन सब वैसे ही जैसे होना चाहिए। जनाब यहां सिर्फ सड़कों पर पानी जमा होता है, दिलों में गुबार नहीं।
देश में अबकी जब अजीब सा माहौल है, बेजा बातों पर बेवजह की पैरोकारी है। ज्ञान की अधिकता है और नीयत सिर्फ अपनी रोटियां सेंकने की है, अपना ओहदा उठाने की है, अपने नंबर बढ़ाने की है, अपना घर भरने की है। ऐसे में आइए बनारस की इन टूटी-फूटी तंग गलियों में, आप किसी भी धर्म-सम्प्रदाय-बिरादरी से हों, बिना रोक-टोक, बेधड़क इन लोकाचारों में हिस्सा लीजिये। महसूस करिए गर्म मौसम की हवा में भी घुली बेतकल्लुफ़ी की तरावट को, जब महानगरों में मैकडी में मिलने वाले दोस्त की तरह आंखे चुराने के बजाय यहां एक कम परिचित भी कचौड़ी-जलेबी का पैसा आपकी जानकारी के बिना ही दे जाएगा, फिर पीछे से आवाज़ लगाएगा कि ‘गुरू, पान चली…’
यही रजा बनारस हौ…

साभार – (अभिषेक त्रिपाठी के फेसबुक वाल से)

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