महाशिवरात्रि से बड़ा कोई परमतत्व नहीं, पुराणों के मुताबिक यह है वजह

वाराणसी। महाशिवरात्रि व्रत फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। इस व्रत को अर्धरात्रिव्यापिनी चतुर्दशी तिथि में करना चाहिए। इस साल शुक्रवार 21 फरवरी को दिन 5 बजकर 12 मिनट से चतुर्दशी लग रही है जो शनिवार 22 मार्च को सायं 6 बजकर 9 मिनट तक रहेगी। अर्धरात्रिव्यापिनी ग्राह्य होने से 21 फरवरी को ही महाशिवरात्रि मनायी जाएगी। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रतिपदा आदि सोलह तिथियों के स्वामी अग्नि आदि देवता होते हैं। यही कारण है कि जिस तिथि का जो देवता स्वामी होता है, उस देवता का उस तिथि में व्रत पूजन करने से उस देवता की विशेष कृपा उपासक को प्राप्त होती है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिव हैं अर्थात शिव की तिथि चतुर्दशी है। इसीलिए प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में शिवरात्रि व्रत होता है, जो मासशिवरात्रि व्रत कहलाता है। शिवभक्त प्रत्येक चतुर्दशी का व्रत करते हैं परन्तु फाल्गुन कृष्णपक्ष चतुर्दशी को अर्धरात्रि में ईशान संहिता के अनुसार ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव होने से यह पर्व महाशिवरात्रि के नाम से विख्यात है। इस व्रत को सभी कर सकते हैं। इसे न करने से दोष लगता है।

निरंकार से साकार रुप के अवतरण का उत्सव

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोधछात्र ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप रहता है। अत: वही समय जीवन रूपी चन्द्रमा का शिवरूपी सूर्य के साथ योग-मिलन होता है। अत: इस चतुर्दशी को शिवपूजा करने से जीव को अभीष्टतम पदार्थ की प्राप्ति होती है। यही महाशिवरात्रि का रहस्य है। शिवरात्रि का पर्व भगवान शिव के दिव्य अवतरण का मंगलसूचक है। उनके निराकार से साकार रूप में अवतरण की रात्रि ही महाशिवरात्रि कहलाती है। वे हमें काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सरादि विकारों से मुक्त करके परम सुख, शान्ति ऐश्वर्यादि प्रदान करते हैं।

माना जाता है ‘व्रतराज’

यह महाशिवरात्रि का व्रत ‘व्रतराज’ के नाम से विख्यात है। यह शिवरात्रि यमराज के शासन को मिटाने वाली है और शिवलोक को देने वाली है। शास्त्रोक्त विधि से जो इसका जागरण सहित उपवास करेंगे उन्हे मोक्ष की प्राप्ति होगी। शिवरात्रि के समान पाप और भय मिटाने वाला दूसरा व्रत नही है। इसके करने मात्र से सब पापों का क्षय हो जाता है।

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