पूरे चुनाव में कांग्रेस ने जो ‘सच्चाई’ थी ‘छिपायी’ वह अंतिम दौर में सामने आयी! गठबंधन के सामने बलिया-बांसगांव में समर्पण

लखनऊ। तीन दशक पहले तक देश और प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के अलावा सोचने के लिए अधिक विकल्प नहीं थे। भाजपा के अलावा क्षेत्रीय दलों का उभार शुरू हुआ तो कांग्रेस का ‘ग्राफ’ धीरे-धीरे गिरने लगा। इस लोकसभा चुनाव में दशा यह हो गयी कि प्रदेश में प्रमुख विपक्षी दल सपा-बसपा गठबंधन सोनिया और राहुल की सीट के अलावा किसी पर वजूद तक स्वीकार करने को तैयार नहीं हुआ। ऐसी दशा में अकेले लड़ने को छोड़ दूसरा विकल्प नहीं था। कुछ छोटे दलों को साथ लेकर कांग्रेस चुनाव मैदान में तो उतरी लेकिन पर्दे के पीछे कुछ दूसरा ही ‘खेल’ चल रहा था। बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश हर सभा में कांग्रेस को खरी-खोटी सुनाते रहे लेकिन प्रियंका ने इस ‘सच’ को स्वीकारने में गुरेज नहीं किया कि उनकी पार्टी वोटकटवा की भूमिका में हैं। अंतिम दौर की वोटिंग से पहले कांग्रेस ने बलिया और बांसगांव में गठबंधन के प्रत्याशी को समर्थन कर साफ कर दिया कि वह किसे जिताने के लिए मैदान में थी।

नहीं बचे थे कोई विकल्प

बलिया का लंबे समय तक प्रतिनिधित्व पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर कर चुके हैं। उनके पुत्र नीरज शेखर दो बार यहां से सांसद रहे लेकिन इस दफा अंतिम दिन उनका टिकट काटते हुए सनातन पाण्डेय को मैदान में उतारा गया। मायावती-अखिलेश की रैली के बाद भी गठबंधन का प्रचार शबाब पर नहीं था। दूसरी तरफ कांग्रेस ने यहां जनअधिकार पार्टी को सीट दी थी लेकिन उसके प्रत्याशी का पर्चा खारिज होन के बाद कोई मैदान में बचा नहीं था। कांग्रेस जिलाध्यक्ष सच्चिदानंद तिवारी ने स्वीकार किया कि हाई कमान ने यहां पर गठबंधन को समर्थन देने का फैसला लिया है जिहाजा अब पार्टी से जुडे लोग इसका पालन करेंगे। यहीं नहीं बांसगांव में भी गठबंधन प्रत्याशी को समर्थन दिया गया है।

पहले से तय था समूचा ‘खेल’

गौरतलब है कि पूरे चुनाव में भले गठबंधन ने खुल कर कांग्रेस को भाजपा सरीखा बताने में गुरेज नहीं किया लेकिन पहले दिन से अंदरखाने में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी। कांग्रेस को रायबरेली व अमेठी में समर्थन देने के अलावा प्रियंका-राहुल के कार्यक्रम में सपा-बसपा के कार्यकर्ता झंडा-बैनर लिये दिखते रहे। यहीं नहीं प्रियंका तो सपा के मंच को साझा करते भी दिखी। कुछ यही कांग्रेस की तरफ से भी रवैया रहा जब उसने अखिलेश-डिंपल से लेकर ‘यादव’ परिवार के सदस्य जिन पांच सीटों पर लड़ रहे थे वहा अपने प्रत्याशी नहीं उतारे। सूत्रों की माने तो अंतिम चरण के मतदान से पहले कांग्रेस के खुले समर्थन से स्पष्ट हो गया कि पर्दे के पीछे से पूरा खेल पहले से तय था। सिर्फ स्थानीय नेता और कार्यकर्ताओं के भुलावे में रखा गया।

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