वही सीर गांव लेकिन इस दफा तस्वीरें कह रही कुछ और कहानी बयां, बावजूद इसके दिखे वही तेवर

वाराणसी। प्रदेश में ऐसा मौका कम ही आया है कि जब कोई मुख्यमंत्री पूरा जोर लगाने के बावजूूद किसी स्थान पर नहीं पहुंच सका हो। एक तरफ पूरा प्रशासनिक अपना ताकत झोंके था तो दूसरी तरफ महिलाओं की सैकड़ों की भीड़ मोर्चा संभाले थी। मायावती जैसी शख्सियत को भीड़ के आगे झुकना पड़ा। जी हां, जिस सीर गांव में गुरुवार को गठबंधन की साझा रैली हुई वही किसी समय सपा और बसपा की तकरार का गवाह बना था। घटनाक्रम दो दशक पुराना है और पहली बार वोट डालने वाले शायद इससे भिज्ञ नहीं हो लेकिन इस आंदोलन ने ऐसी जमीन तैयार की थी कि लंबे समय तक बसपा को जिलो में एक सीट के लिए तरना पड़ा था। गुरुवार को बसपा सुप्रीमो मायावती के आगे सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश के नम्र तेवर देख पुरनिया लोगों में खासी नाराजगी भी रही।

भूमि अधिग्रहण को खिलाफ खुला था मोर्चा

दरअसल गेस्ट हाउस कांड के बाद पहली बार मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती ने संत रविदास की तपोस्थली सीर को लेकर खासा कुछ करने की योजना तैयार की थी। गंगा के किनारे घाट से लेकर दूसरे तमाम कार्य होने थे। इसकी खातिर भूमि अधिग्रहित की जानी थी। सपा ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। स्व. मनोज राय पप्पू और सतीश फौजी सरीखे नेता इसी आंदोलन की देन है जिन्होंने मुख्यमंत्री के खिलाफ मोर्चा खोल कर उन्हें यहां आने नहीं दिया। कई दिनों तक इलाका छावनी बना रहा लेकिन सपा ने यहां मायावती को झुकने पर मजबूर कर दिया। गठबंधन होने के बाद अब स्वर बदल चुके हैं लेकिन रैली के चलते लोगों को पुराने दिनों की याद जाता हो गयी।

महिलाओं के संग धक्का-मुक्की, टूटी कुर्सियां

सीर में अखिलेश यादव और मायावती साथ चौधरी अजीत सिंह ने जनसभा को संबोधित किया। गुरुवार की रैली के बाद जैसी ही नेता मंच से उतरे वैसी ही कार्यकर्ताओं में चेहरा दिखाने की होड़ सी मच गयी। यहां प्रत्याशी भले महिला हैं लेकिन औरतों के बदसलूकी उनके सामने हुई। कुछ देर पहले जिस मंच से मायावती और अखिलेश महिलाओं के सम्मान के दावे कर रहे थे वहीं उनके कार्यकर्ता महिलाओं को धक्का मुक्की देते हुए आगे बढ़ने की कवायद में जुटे हुए थे। कुल मिला कर वहां की दशा टूटी कुर्सियां और मीडया गैलरी दर्शा रही थी। हर ओर अफरा-तफरी का माहौल था जिसे नियंत्रित करने में पुलिस को खासा जोर लगाना पड़ा।

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