संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के प्रोफेसर ने पूछा सुलगता सवाल, एक ही विश्वविद्यालय में दो संस्कृत विभाग क्यों?

वाराणसी। इन दिनों बीएचयू के संस्कृत विभाग में मुस्लिम प्रोफेसर की नियुक्ति का मामला खासा गरमाया है। इस मुद्दे पर ज्योतिष विभाग के संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के प्रोफेसर गिरिजाशंकर शास्त्री ने सुलगते सवाल उठाये हैं। उनका कहना है कि धर्मप्राण भारतरत्न महामना पं. मदनमोहन मालवीय जी ने विशेष उद्देश्य से धर्म, ज्ञान- विज्ञान एवं मोक्ष की नगरी वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की संस्थापना की। धर्म अत्यन्त व्यापक शब्द है, इसकी गति भी अत्यन्त सूक्ष्म है। धर्म और धर्म का तत्व भी बड़े -बड़े महापुरुषों महामनीषियों के बुद्धिरुपी गुहा में स्थित है, समग्र धर्म तो परमात्मा ही है जिसे सनातन परम्परा द्वारा जानने की चेष्टा सर्वदा से होती रही है है, सनातन धर्म शाश्वत है, यह किसी महापुरुष या व्यक्ति विशेष द्वारा नही चलाया गया है। जबकि अन्य धर्म किसी न किसी व्यक्ति के द्वारा प्रवर्तित किये गये हैं। यही कारण है कि इन धर्मों को सम्प्रदाय कहा गया है। सनातन धर्म की रक्षा हेतु परमात्मा का भी समय-समय पर अवतरण होता रहा है।

इसी खातिर की थी कला संकाय से अगल स्थापना

प्रो. शास्त्री का मानना है कि सनातन संस्कृति के रक्षक वेद एवं वेदांग ही हैं। इसी की रक्षा हेतु भगवान के विशेष अंश से अवतरित दूरदर्शी महामना मालवीय ने सर्वप्रथम संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय की स्थापना की। कालान्तर में संस्कृत भाषा एवं संस्कृत ज्ञान के प्रचार प्रसार हेतु बीएचयू के कला संकाय में एक अन्य संस्कृत विभाग की भी स्थापना की। संस्कृत के दोनो विभागों का उद्देश्य पृथक-पृथक है।

हिन्दू के अलावा किसी की नियुक्ति का प्राविधान नहीं

संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान के प्राध्यापकगण मालवीय भवन में होने वाले कृष्णजन्माष्टमी, गीताप्रवचन, ऋषिपूजन, श्रावणीकर्म, सरस्वती पूजा, विश्वविद्यालय स्थित विश्वनाथ मंदिर में पूजन-अर्चन प्रत्येक वर्ष समयानुसार करते हुए वेद-वेदांग की शिक्षा प्रदान करते हुए सनातन धर्म की रक्षा करते हैं। जबकि संस्कृत विभाग का सम्बन्ध अन्य विषयों की भांति केवल पठन- पाठन, शोधकार्य तथा अन्य संस्कृत से सम्बन्धित गतिविधियों में सीमित हैं। अतएव मालवीय जी का दो विभाग स्थापित करने का उद्देश्य भी यही था। अतएव महामना ने नियम निर्देश करते हुए शिलापट्ट में नैष्ठिक हिन्दू के अतिरिक्त अन्य किसी भी धर्मावलंबी के लिए संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय में अनुमति नहीं प्रदान की होगी।

Related posts