लखनऊ। जैसी की पहले से आशंका जतायी जा रही थी आगामी लोकसभा चुनावों के लिए सपा-बसपा के गठबंधन हो गया है। लगभग ढाई दशक के बाद दोनों दल मिल कर कोई चुनाव लड़ने वाले हैं। इससे पहले लोकसभा उपचुनावों में भले ही अखिलेश क्रेडिड देते रहे हो लेकिन बसपा ने इन पर प्रत्याशी तक उतारने की भी तैयारी नहीं की थी। भले औपचारिक घोषणा नहीं हुई हो लेकिन सूत्रों की माने तो समझौते के तहत सपा-बसपा 37-37 सीटों पर लड़ेंगी। कांग्रेस को इस गठबंधन से बाहर कर दिया गया लेकिन अमेठी और रायबरेली में यह गठबंधन प्रत्याशी नहीं उतारेगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक आस लगाये बैठे क्षेत्रीय दलों को इससे खासा झटका लगा है। कुल 80 में से 76 तो बंट गयी अब रालोद समेत कोई दूसरा इसका हिस्सा बनता है तो बची चार सीटों पर बंटवारा होगा।

सवालों के दायरे में चौधरी का साख के संग रूआब

एक जमाना था कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के जाट नेता चौधरी चरण सिंह प्रदेश में कांग्रेस के विरोध में विपक्ष के चेहरा होते थे। सड़क से लेकर संसद तक उन्होंने ललकारा ही नहीं था बल्कि नीतियों को बदलने पर मजबूर किया था। मुलायम सिंह यादव ने उन्हीं की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा पढ़ा था। उनके बाद पुत्र चौधरी अजीत सिंह ने विरासत को आगे बढ़ाया था। जाट लैंड या हरित प्रदेश में चौधरी का सिक्का चलता था। पौत्र जयंत के कमान संभालने तक पार्टी की यह हालत हो चुकी है कि एक-दो सीटों पर लड़ने की खातिर महागठबंधन का हिस्सा बनने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। अपने हितों को देखते हुए भले चौधरी इस समझौते को कर लें लेकिन उनके समर्थकों का बड़ा हिस्सा पिछले चुनावों की तरह भाजपा की तरफ जा सकता है।

नाम तक नहीं बचा पायेंगे छोटे दल

कुछ समय पहले तक अखिलेश यादव छोटे दलों के कार्यक्रम में शिरकत करने के साथ उनका सम्मान बरकरार रखने का दावा करते फिर रहे थे। पिछले दिनों चौहान समाज की रैली में उनकी पार्टी का साथ देने का वादा किया था। जातियों पर आधारित ऐसे कई दूसरे दलों को भी उम्मीद थी कि सपा के साथ चुनावी वैतरणी पार हो सकती है। बसपा के वोट वैंक के आगे इन दलों के सपने ही चकनाचूर नहीं हुए बल्कि साफ हो गया कि साथ एकतरफा रहेगा और सीट गठबंधन को जिताने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं है। गोरखपुर उपचुनाव की तर्ज पर यदि किसी का आधार हुआ भी तो उसे पार्टी के टिकट पर लड़ा कर विकल्प नहीं छोड़ा जायेगा।

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