जौनपुर। जिन दिनों मुन्ना बजरंगी उभर रहा था उस समय पूर्वांचल में सिर्फ मुख्तार अंसारी और बृजेश सिंह आतंक का पर्याय माने जाते थे। इनसे जुड़े गुर्गे वारदात को अंजाम देते थे लेकिन पिस्टल और कारबाइन तक ही सीमित थे। बजरंगी का नाम पहली बार उस समय चर्चा में आया था जब जिला जेल जौनपुर के बाहर उसने बक्शा के ब्लाक प्रमुख रामचंद्र सिंह को मौत के घाट उतार दिया था। यहीं नहीं उनके गनर को गोली मार कर कारबाइन छीन कर भाग गया था। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक पूर्वांचल में पहली बार एके 47 का इस्तेमाल मुन्ना बजरंगी ने ही रामपुर तिहारा हत्याकांड में किया था। मडियाहूं के ब्लाक प्रमुख कैलाश दूबे और भाजपा नेता राजकुमार सिंह के अलावा एक बच्ची मारी गयी थी। उन दिनों बनारस जोन नहीं था और तत्कालीन आईजी जोन गोरखपुर ने कई दिनों तक कैंप कर बजरंगी से जुड़े लोगों के खिलाफ जबरदस्त अभियान चलाया था। इसके बाद कई राजनैतिक हत्याओं को अंजाम देकर उसने अपनी अलग हनक कायम कर ली थी।

कई राजनेताओं का मिलता था संरक्षण

बजरंगी को भले मुख्तार का करीबी कहा जाता हो लेकिन उसे सरंक्षण देने का आरोप कई दूसरे बड़े राजनेताओं पर भी लगता रहा है। कैलाश दूबे की बजरंगी से कोई दुश्मनी नहीं थी लेकिन उसके आका गजराज सिंह जिससे जुड़े थे वह रंजिश रखता था। कैलाश दूबे को भाजपा से टिकट मिलना तय था और विधानसभा चुनाव न लड़ पाये इसके लिए वारदात को अंजाम दिलाया गया। कृष्णानंद राय से भी बजरंगी की सीधी दुश्मनी नहीं थी और यह हत्याकांड भी राजनैतिक कारणों के चलते हुआ था।

अलग पहचान बनना पड़ा भारी!

पिछले काफी समय से बजरंगी अपनी अलग पहचान बनने में जुटा था। यहां तक कि अपने ‘आका’ तक को परोक्ष रूप से कई मामलों में चुनौती दे दी थी। राजनैतिक सम्पर्क मजबूत होने और कारोबार को विस्तार देने के बाद वह चाहता था कि किसी की छाया में न रहे। सूत्रों की माने तो यह प्रयास ही उसे भारी पड़ गया। जिनकी छत्रछाया में वह बढ़ा था उन्हीं की आंखों में खटकने लगा।

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