पहले था ब्रांडेड कपड़े-जूतों का शौक लेकिन गर्लफ्रैंड की फरमाइशें पूरी करने में बने शातिर चोर, दो दर्जन बाइक के साथ धराये तो हुआ खुलासा

वाराणसी। आंकड़ों के मुताबिक कैंट, सिगरा और लंका में सर्वाधिक वाहनों की चोरी होती है। वजह, यहां पर आने वालों की संख्या अधिक है और कचहरी या बीएचयू में वाहन खड़ा कर जाने के बाद देरी से वापसी होती है। कैंट पुलिस ने अंतरजनपदीय गिरोह के सदस्यों को दबोचा तो उनसे मिली जानकारी पर वाहनों को बटोरने में हलकान हो गयी। एक-दो नहीं बल्कि लगभग दो दर्जन दो पहिया वाहनों की बरामदगी हो चुकी है। इस गुडर्वक के चलते वाराणसी पुलिस को डीजीपी की तरफ से जारी होने वाली सूची में पहला स्थान मिला है।

करते थे बदलाव, छात्रों को थमाते थे वाहन

एसएसपी आनंद कुलकर्णी ने सोमवार को गिरफ्तार गिरोह के सदस्यों को मीडिया के सामने पेश किया। इन्होंने कबूला कि हम लोग हाई स्कूल-इण्टर की पढ़ाई करने के बाद अपने व अपनी गर्ल फ्रेन्डों का शौक पूरा करने के लिये कैट के कचहरी,डीडीयू हास्पिटल व शिवपुर तथा अन्य जगहों से मोटर साइकिलों को चुराकर बिहार, चंदौली,मीरजापुर,गाजीपुर तथा जौनपुर में स्कूल व कालेजों में पढ़ने वाले लड़कों को औने पौने दाम में बेचकर पैसा कमाते थे। किसी को शंका न हो इसलिये बबलू राजभर की दुकान मां वैष्णों हीरो होन्डा सर्विस सेन्टर सिधौना (फूलपुर) में गाड़ियों के इंजनों को आपस में अदला बदली कर व उनके कलपुर्जों को बदल कर नई गाड़ियां तैयार कर बेचते थे। इसके अलावा पुरानी गाड़ियों को काट कर तथा उनके नम्बर प्लेटों को आपस में बदलकर बेचते थे जिससे कि पकड़े जाने के चांस बहुत कम रहते थे। बिक्री स्कूल व कालेज में पढ़ने वालों को इस खातिर होती थी कि वह अपना स्कूल/ कालेज का आईकार्ड दिखाकर पुलिस से आसानी से बच जाते थे। चोरी के वाहनों को बेचकर मिले धन से मंहगें कपड़े जूते व अच्छी-अच्छी मोड़ीफाइड गाड़ियां खरीदते थे और अपनी अपनी गर्ल फ्रेन्डों को काफी महंगे गिफ्ट खरीदते थे।

गैरेज के चलते नहीं होता था शक

गिरफ्तार शुभम सिंह,सचिन कुमार गौतम, बबलू राजभर (मिस्री), सुभाष कुमार और दीपक कुमार पटेल का कहना था कि हम लोगों से गाड़ियों को खरीदने वालों की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। दाम कम होने के नाते यह आसानी से बिक भी जा रही थी। लोगों को किसी प्रकार का शक भी नही होता था क्योंकि बबलू राजभर(मिस्त्री) के मोटर साइकिल सर्विस सेन्टर से गाड़ियों को आसानी से बेचा जाता था जिससे आम लोग समझते थे कि गाड़ियां सर्विसिंग के लिये आती जाती हैं। यह कार्य हम लोग लगभग दो वर्षों से कर रहे हैं।

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