जाटलैंड में ‘इतिहास’ बना चौधरी परिवार, लगातार दूसरी हार से हुआ साफ कि इलाके में अब दूसरों का ‘प्रभाव’

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के चुनावों से पहले जब अखिलेश यादव ढाई दशक पुरानी अदावत भुला कर मायावती के साथ गठबंधन करने में जुटे थे तो पश्चिम उत्तर प्रदेश से ‘चौधरी परिवार’ जुड़ने के लिए बेकरार था। डिमांड आठ सीटों से आरम्भ हुई लेकिन मायावती ने साफ कर दिया कि वह अपने कोटे के 38 सीटों के संग कोई समझौता करने के मूड में नहीं है। दो सीटे कांग्रेस परिवार के लिए छोड़ी गयी थी जिससे साफ था कि जाटों के बीच खासा असर रखने वाले चौधरी परिवार को इससे अधिक सीटें नहीं मिलेंगी। गठबंधन की खातिर सभी की हर शर्त मानने के क्रम में अखिलेश ने अपने कोटे से एक सीट और दी। परिणाम आये तो साफ हो गया कि जाटलैंट में चौधरी परिवार अब इतिहास बन चुका है।

पुश्तैनी सीट पर मिली जयंत को हार

प्रदेश में रायबरेली हो या अमेठी। गांधी परिवार की भी दो पुश्तें ही इन पर लड़ी है। बावजूद इसके बागपत एक सीट सीट रही है जहां से जयंत चौधरी तीसरी पीढ़ी के नुमाइंदे बन कर चुनाव मैदान में थे। यहां से उनके दादा और पूर्व पीएम व सीएम रह चुके देश के बड़े किसान नेता चौधरी चरण सिंह जीते थे। पिता अजीत सिंह को भी कई बार विजय मिली थी। पुश्तैनी सीट होने के बावजूद जयंत चौधरी को भाजपा के सत्यपाल सिंह के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा।

जात पर भारी पड़ी ‘खाप’

उधर अजीत सिंह खुद मुजफ्फरनगर से चुनाव मैदान में उतरे। यहां जाटों की संख्या को देखते हुए जीत तय मानी जा रही थी। अजीत भी अपनी जीत को लेकर कुछ इस कदर मुतमईन थे कि पूरे प्रदेश में वह अखिलेश-मायावती के साथ संयुक्त जनसभा कर खोयी जमीन तलाश कर रहे थे। मुकाबला भाजपा के संजीव बलियान से था। जानकारों का कहना है कि संजीव की खाप यहां खासी असरकारक साबित हुई। उन्हें बड़ी संख्या में जाटों का वोट मिला साथ ही दूसरे वोटों ने अजीत की हार तय कर दी।

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