वाराणसी। सूबे में सपा के शासनकाल के दौरान चर्चा में रहने वाले पूर्व इंस्पेक्टर कैंट रतन सिंह यादव की मुश्किले बढ़ती जा रही है। उनका प्रमोशन सीओ के रूप में हो चुका है लेकिन पुराने मामले फिर से उभरने लगे हैं। कैंट में दो सगे भाइयों शंकर यादव तथा बलराम यादव को एक पखवारे तक अवैध रूप से हवालात में रखने के मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख अख्तियार किया है। आयोग का मानना है कि यह ऐसा मामला है जिसमें पीड़ित को मुआवजा देना चाहिये। प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव को नोटिस जारी करते हुए एनएचआरसी ने छह सप्ताह के भीतर जवाव मांगा है। दो साल पुराने इस मामले में तत्कालीन एसएसपी ने खुद थाने जाकर दोनों भाइयों को हवालात से मुक्त कराने के संग पूछताछ की वीडियो रिर्काडिंग करायी थी और मामले को लेकर भेजी रिपोर्ट के आधार पर ही कार्रवाई हुई है।

डीआईजी की रिपोर्ट में माने गये थे दोषी

मानवाधिकार जन निगरानी समिति के डा. लेनिन रघुवंशी ने एनएचआरसी से शिकायत की थी जिसमें इंस्पेक्टर कैंट रतन सिंह यादव द्वारा अवैध रूप से सगे भाइयों को हवालात में रखने का प्रकरण था। इसके साथ समाचार पत्रों की कटिंग भी संलग्न थी। आयोग ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश शासन से रिपोर्ट मांगी थी। एनएचआरसी को पुलिस अधीक्षक (मानवाधिकार) ने जो रिपोर्ट भेजी उसमें डीआईजी रेंज वाराणसी द्वारा की जांच का हवाला था। डीआईजी ने जांच के दौरान, तब एसओ रतन सिंह यादव को पुलिस स्टेशन में अवैध / अनधिकृत हिरासत में पंचम यादव, पप्पू यादव, बलराम यादव और शंकर यादव को रखने का दोषी पाया गया। यह भी कहा गया है कि रतन यादव की चरित्र पंजिका में बैड इंट्री प्रविष्टि द्वारा दंडित किया गया है।

आयोग ने माना मामले में मुआवजा दें

एनएचआरसी ने प्रदेश शासन के प्रतिवेदन और रिपोर्ट पर विचार किया। आयोग की राय में पीड़ित व्यक्तियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन का मामला सामने आया है और उन्हें मुआवजा देने के योग्य हैं। अधिनियम की धाराओं के तहत नोटिस जारी करते हुए उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से पूछा गया है कि जब अवैध हिरासत में रखने के दोषी हैं तो क्यों न पीड़ितों को मुआवजा दिया जाये। आयोग ने 6 सप्ताह के भीतर जबाव देने को कहा है।

736

admin

No Comments

Leave a Comment