लखनऊ। पिछले विधानसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल करने के बाद भाजपा सातवें आसमान पर थी। जीत के पीछ प्रमुख कारण जातियों पर आधारित छोटे दलों को अपने पाले में करना था। बावजूद इसके पार्टी को मुगलता था कि समूची जीत पीएम मोदी के नाम पर मिली है। नतीजा, विधानसभा में अपने दम पर दो तिहाई बहुमत के चलते सहयोगियों की उपेक्षा शुरी कर दी। दूसरी तरफ सत्ता से बेदखल हुए अखिलेश ने इन समीकरणों को भांप लिया था। इसी का परिणाम था कि वह एक-दो जिलों में प्रभाव रखने वाले जाति आधारित दलों के कार्यक्रम में शामिल होने लगे। यही नहीं गोरखपुर में तो पार्टी के किसी व्यक्ति को टिकट भी नहीं दिया बल्कि निषाद पाटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष क बेटे को सिंबल थमा कर मैदान में उतार दिया। रही सकी कसर तराई में प्रभाव रखने वाली पीस पार्टी को अंतिम समय अपने पाले में कर पूरी कर ली।

निषाद पार्टी की उपेक्षा पड़ी भारी!

गौरतलब है कि निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. संजय निषाद अब तक कोई चुनाव नहीं जीत सके हैं। बावजूद इसके पूर्वांचल के कुछ जिलों में पार्टी का बेस वोट बैंक है। पिछले विधानसबा चुनाव में पार्टी के टिकट पर बाहुबली विजय मिश्र को जीत हासिल हुई थी जबकि धनंजय सिंह कांटे के संघर्ष में हारे थे। विजय मिश्र ने सदन से लेकर मंच तक सपाका विरोध किया था लेकिन भाजपा ने इस पर ध्यान नहीं दिया। सूत्रों की माने तो निषाद पार्टी के अध्यक्ष को ‘समायोजित’ करनो का प्रस्ताव था लेकिन जीत के मद में भाजपा ने इसे ठुकरा दिया। अखिलेश ने इस मौके का फायदा उटाते हुए उनके बेटे को अपना सिंबल थमा दिया।

दावों से इतर बसपा के वोट नहीं थे ट्रांसफर

जीत के बाद भले इसे बुआ-भतीजे की जोड़ी का कमाल बताया जा रहा है लेकिन बसपा का बेस वोटर चुनाव को लेकर उत्साहित नहीं था। जो बूथ तक पहुंचा भी वह हाथी का निशान न देख कहीं बटन दबा दिया। सम्भवत: कम पोलिंग का एक कारण बसपा के वोट का उत्साहित न रहना भी रहा। अलबत्ता उसने भाजपा को वोट नहीं दिया जिसके चलते सपा प्लस में रही।

admin

No Comments

Leave a Comment