लखनऊ। सूबे के शराब के कारोबार पर लगभग एक दशक तक से अधिक समय काबिज फोंटी चड्ढा ‘सिंडिकेट’ के लिए नयी आबकारी नीति किसी खतरे की घंटी सरीखी है। अब तक तो जिले में थोक के कारोबार पर एकाधिकार हने के नाते सिंडिकेट तय करता था कि कौन की ब्रांड बिकनी है और किसे नहीं। नयी नीति में इससे बंदिश हटा ली गयी जिसके चलते लाइसेंस फीस जमा कर कोई भी थोक के कारोबार निर्धारित शर्तो के तहत कर सकता है। इसका नतीजा है कि पूर्वांचल के पुराने धुरंधर एक बार फिर से लामबंद हो रहे हैं। धुर विरोधी भी सिंडिकेट से बदला चुकाने के लिए एक मंच पर आने को तैयार हैं। सूत्रों की माने तो अने वाले कुछ दिनों में चौंकाने वाले समीकरण सामने आ सकते हैं जिसका असर कारोबार पर दिखेगा।

अरसे बाद लाइसेंस के लिए होंगे टेंडर

सत्ता के समीकरण साधने में महारथ रखने वाले चड्ढा ग्रुप ने सूबे में मायावती की सरकार बनने के बाद शराब के कारोबार पर एकाधिकार कर लिया था। सपा का शासन आया लेकिन ग्रुप के सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। पुराने तौर-तरीकों से धंधा चलता रहा। पिछले साल सत्ता परिवर्तन की आहट मिलने पर नियत तिथि से पहले सभी औपचारिकता पूरी कर ली गयी लेकिन इस बार पांव तले जमीन खिसक चुकी है। नयी नीति के तहत सभी दुकानों के लाइसेंस के लिए ई-टेंडर पड़ने हैं। इलाकावार दुकानों पर एकाधिकार रखने वाले इससे बौखला गये हैं। एक-एक दुकान के लिए दर्जनों आवेदन भरवाने की तैयारी चल रही है। लाखों रुपये फीस के रूप में भरने के बाद भी निश्चित नहीं है कि दुकान मिलेगी।

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