श्रीनृसिंह चतुर्दशी व्रत शुक्रवार को, जानिये इसका महत्व और पूजन-विधि

वाराणसी। स्वयं प्रकाश परमात्मा जब भक्तों को सुख देने के लिए अवतार ग्रहण करते हैं, तब वह तिथि और मास भी पुण्य के कारण बन जाते हैं। जिनके नाम का उच्चारण करने वाला पुरुष सनातन मोक्ष को प्राप्त होता है, वे परमात्मा कारणों के भी कारण हैं । वे सम्पूर्ण विश्व के आत्मा, विश्वस्वरूप और सबके प्रभु हैं। वे ही भगवान भक्त प्रह्लाद का अभीष्ट सिद्ध करने के लिए नृसिंह रूप में प्रकट हुए थे और जिस तिथि को भगवान नृसिंह का प्राकट्य हुआ था, वह तिथि महोत्सव बन गई। यह व्रत वैशाख शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को किया जाता है। जो इस वर्ष शुक्रवार 17 मई को पड़ रही है। व्रत के दिन प्रात:काल में सूर्यादि को व्रत करने की भावना निवेदन करके तांबे के पात्र में जल लें और

दो दिन तक चलता है धार्मिक कृत्य

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोधछात्र ज्योतिषाचार्य पंं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक पूजन के लिए ‘नृसिंह देवदेवेश तव जन्मदिने शुभे, उपवासं करिष्यामि सर्वभोगविवर्जित:’ इस मंत्र से संकल्प करके मध्याह्न के समय नदी आदि पर जाकर क्रमश: तिल, गोमय, मृत्तिका, और आंवले मलकर पृथक-पृथक चार बार स्नान करें। इसके बाद शुद्ध स्नान करके वहीं नित्य कृत्य करें। फिर घर आकर क्रोध, लोभ, मोह, मिथ्याभाषण, कुसंग और पापाचार आदि का सर्वथा त्याग करके ब्रह्मचर्य सहित उपवास करें। सायंकाल एक वेदी पर अष्टदल बनाकर उसपर सिंह, नृसिंह और लक्ष्मी की सोने की मूर्ति स्थापित करके पूजन करें। रात्रि में गायन वादन, पुराण श्रवण या हरि संकीर्तन से जागरण करे। दूसरे दिन फिर पूजन करें। और ब्राह्मणों को कराकर स्वयं भोजन करें। इस प्रकार प्रतिवर्ष करते रहने से नृसिंह भगवान उसकी सब जगह रक्षा करते हैं। और यथेच्छ धनधान्य देते हैं।

इसी व्रत के चलते बने भक्तराज प्रह्लाद

नृसिंह पुराण में इस व्रत की कथा है। उसका सारांश यह है कि जब हिरण्यकशिपु का संहार करके नृसिंह भगवान कुछ शान्त हुए, तब प्रह्लाद जी ने पूछा कि भगवन अन्य भक्तों की अपेक्षा मेरे प्रति अधिक स्नेह होने का क्या कारण है? तब भगवान ने कहा कि पूर्वजन्म में तू विद्या हीन, आचारहीन, वासुदेव नाम का ब्राह्मण था। एक बार मेरे व्रत के दिन (वैशाख शुक्ल चतुर्दशी) विशेष कारण वश तूने न जल पिया न भोजन किया, न सोया और ब्रह्मचर्य से रहा। इस प्रकार स्वत: सिद्ध उपवास और जागरण हो जाने के प्रभाव से तू भक्तराज प्रह्लाद हुआ।

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