वाराणसी। शहर दक्षिणी में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में पूर्व सांसद डॉ राजेश मिश्र के नाम की घोषणा हो गयी है। सपा-कांग्रेस गठबंधन के तहत कांग्रेस के कोटे में आयी इस सीट पर राजेश गुरु के आते ही कई समीकरण बनने-बिगड़ने लगे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि इस सीट पर तीनों प्रमुख दलों ने ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें बसपा ने तो कई महीने पहले ही राकेश त्रिपाठी को टिकट देकर मैदान में उतार रखा है और वे लगातार प्रचार में जुटे हैं। कांग्रेस उम्मीदवार डॉ राजेश मिश्र की क्षेत्र में अच्छी पकड़ है। दूसरी तरफ भाजपा प्रत्याशी नीलकंठ तिवारी भी अपने पूर्ववर्ती की विरासत बचाने की दौड़ में शामिल हैं। मुकाबला भी प्रमुख रूप से इन तीनों उम्मीदवारों के बीच ही होता दिख रहा है। देखा जाय तो इस चुनाव में ब्राह्मण और मुसलमान परिणाम में उलटफेर लाने में एक बड़े फैक्टर का काम करेंगे। कहने में गुरेज नहीं कि राजेश गुुरु के आने से दक्षिणी में लड़ाई फंस गयी है।
संसद में बनारस का प्रतिनिधित्व कर चुके डॉ राजेश मिश्र के लिए दक्षिणी में नाम का संकट नहीं है। टिकट फाइनल होने के पहले से ही उनके नाम का कयास लगया जा रहा था। अब उनके नाम की अधिकृत घोषणा हो चुकी है और इसके साथ ही क्षेत्र में सियासी जोड़-तोड़ भी शुरू हो चुका है। कांग्रेस उम्मीदवार की इस बार की उपस्थिति कई मायने में मजबूत मानी जा रही है। सबसे बड़ी वजह पार्टी का सपा से गठबंधन होना है, जिसका फायदा डॉ राजेश को अवश्य मिलेगा। उसके अलावा कांग्रेस के अपने परंपरागत वोट के साथ ही युवाओं में अच्छी पैठ रखने का फायदा भी उन्हें मिलेगा। डॉ राजेश मिश्र को नाविकों और उनसे जुड़ी उप जातियों का वोट भी मिल सकता है, क्योंकि वे लंबे समय से उनसे जुड़े हुए हैं और उनके आंदोलनों को कांग्रेस प्रत्याशी का सपोर्ट मिलता रहता है। डॉ राजेश मुस्लिम मतदाताओं में भी अच्छी पकड़ रखते हैं। ये सारे समीकरण उनके लिए कितने फायदेमंद होंगे, यह परिणाम से साबित होगा।
बसपा ने यहां से राकेश त्रिपाठी को हाथी की सवारी करा रखी है। मुंबई में अपना कारोबार छोड़ कई महीनों से काशी में रहकर चुनाव प्रचार कर रहे राकेश त्रिपाठी ने इस बीच क्षेत्र में अपनी पैठ बनायी है। मूलरूप से कज्जाकपुरा के रहने वाले राकेश बाढ़ के वक्त जरुरतमंदों के लिए आवास व भोजन की व्यवस्था कर काफी सुर्खियां बटोर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने इस दौरान मुस्लिम इलाकों में भी मेहनत कर अपनी पहचान बनाने की कोशिश की है। अंतिम समय में वे इन्हें अपने वोट बैंक में कितना बदल सकेंगे, ये वक्त ही बताएगा।
वहीं, भाजपा प्रत्याशी व सेंट्रल बार के पूर्व अध्यक्ष नीलकंठ तिवारी के लिए परिस्थितियां उतनी अनुकूल नहीं हैं, जितनी भाजपा उम्मीदवार के तौर पर होनी चाहिए थी। उन्हें मौजूदा विधायक श्यामदेव रायचौधरी और दूसरे दावेदार डॉ दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ पर वरीयता देते हुए टिकट दिया गया। नतीजा, वे घर में रोष-प्रतिरोध में घिर गये हैं। पार्टी कार्यकर्ता इसके चलते दो धड़े में बंटे हैं। उस पर से ‘दादा’ का यह कहना कि वे विरोध नहीं करेंगे तो प्रचार भी नहीं करेंगे, नीलकंठ के लिए परेशानी पैदा कर सकती है। नीलकंठ तिवारी भी युवा हैं और क्षेत्र के युवाओं में उनकी पैठ है, लेकिन यदि पार्टी का ही पूरा सपोर्ट नहीं मिला तो उनके लिए चुनावी वैतरणी पार कर पाना काफी जटिल हो जाएगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि इस बार दक्षिणी सीट पर कोई अप्रत्याशित रिजल्ट आता है तो कोई चौंकने वाली बात नहीं होगी।

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