वाराणसी। लोकसभा चुनाव अगले साल होने हैं। उपचुनाव में दो सीटों की जीत का कोई फर्क भी मौजूदा स्थिति पर पड़ने वाला नहीं है। बावजूद इसके जीत के बाद बुधवार की शाम सपाई अपने पुराने रंग में आ गये। ढोल-नगाड़े के साथ दूसरों को अबीर का स्नान करा रहे सपाई जिस अंदाज में आपत्तिजनक नारेबाजी कर रहे थे उसे देख कर लोग सहम गये। दबी जुबान से लोगों का कहना था कि अगर यह आगाज है तो अंजाम क्या होगा। दोबारा सत्ता मिलने में चार साल बाकी है और लोकसभा में अपने बूते सरकार नहीं बना सकते लेकिन हाल यह है?

गले मिलते देखे गये धुर विरोधी

यह मंजर सिर्फ काशी का नहीं था बल्कि पूर्वांचल के दूसरे जिलों में भी कमोवेश यहीं देखने को मिल रहा था। पिछले दो दशकों से एक-दूसरे को पानी पीकर कोसने वाले राजनेता गले ही नहीं मिल रहे थे बल्कि एक-दूसरे का मुंह मीठा करा रहे थे। अलबत्ता यह कहना नहीं चूक रहे थे कि यह गठबंधन नही था बल्कि प्रत्याशी खड़ा न कर पाने की दशा में समर्थन था। सपाई पूरे फार्म में दिख रहे थे और कुर्ता-कमीज की आस्तीन चढ़ाते हुए पुलिस को यह बताने से नहीं चूक रहे थे चार साल बाद हमी को दोबारा आना है। चौकाने वाला पहलू यह भी खा कि बसपाई कहीं खुल कर नहीं दिख रहे थे। बुलावे पर जो पहुंचे भी वह कोरम के तौर पर ‘जश्न’ में शामिल दिख रहे थे। लोकसभा में संख्या बल शून्य होने का मलाल उन्हें साल रहा है।

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