बलिया। स्वास्थ्य विभाग में कुछ साल पहले हुए एनआरएचएम घोटाले की आंच में बसपा प्रमुख मायवती के दाहिने हाथ कहे जाने वाले बाबू सिंह कुशवाहा कुछ इस कदर झुलसे की कि अब तक राजनैतिक पुर्नवास नहीं हो सका। छींटे मायावती समेत दूसरों पर भी पड़े। सत्ता किसी की रही हो लेकिन यह महकमा हमेशा से सरकारी धन के गबन के लिए मशहूर रहा है। ताजा मामला सपा के शासन काल में बलिया का है। यहां हाल ही में हुई आॅडिट में एक से बढकर एक घोटाले सामने आए हैं। इसमें प्रमुख रुप से बिना टेंडर, कोटेशन व बिल बाउचर के करोडों का भुगतान से लेकर प्रतिबंधित फर्म से दवा खरीद और भुगतान जैसी गम्भीर अनियमितता शामिल है। गलत तरीके से करोड़ों का भुगतान पांच फर्मों को किया गया है। इनमें कुछ फर्म जनपद की है तो कई बाहरी। खास यह कि एनएचएम के सरकारी धन को अपने पर्सनल खाते में ट्रांसफर कर लिया गया है। ऐसा करने वाले कोई और नहीं, बल्कि प्रभारी चिकित्साधिकारी और ब्लॉक स्तर पर लगाए गए एकाउंट मैनेजर है। यही ही नहीं, स्वीकृत दर से अधिक दर पर भुगतान किया गया है। विभिन्न फर्मों को तो बिना टेंडर या कोटेशन तथा बिना बिल-वाउचर के डेढ़ करोड़ का अनियमित भुगतान का मामला प्रकाश में आया है। यह सब सीएमओ की नाक के नीचे होता रहा है। साफ है कि करोड़ों का भुगतान और खुलेआम अनियमितता हो और उच्चधिकारियों के संज्ञान में ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता।

एमओआईसी व लेखा प्रबंधक का पकड़ाया गबन

तीन महीने पहले तक नरही में तैनात एमओआईसी डा. आनंद कुमार का विवादों से पुराना नाता रहा है। मंत्री हो या डीएम या फिर शासन की ओर से आने वाले नोडल अधिकारी, अस्पताल में कभी उनकी उपस्थिति सुनिश्चित नहीं करा सके। वजह कि बिना डर-भय के डाक्टर आनंद यहां से नदारद रहते थे। नरहीं में तैनाती के दौरान एनएचएम के 2.25 लाख रुपये डा. आनंद अपने व्यक्तिगत खाते में ट्रांसफर कर लिए थे। इसके अलावा वायना में तैनात ब्लॉक लेखा प्रबंधक अभिनव राय 84 हजार रुपये अपने खाते में ट्रांसफर करा लिए। ये दोनों सरकारी धन के गबन में साफ पकड़े गए हैं।

प्रतिबंधित फर्म से की दवा खरीद

इसके साथ दवा खरीद में सीएमओ की भी स्पष्ट गलती आॅडिट टीम ने पकड़ी है। कानपुर की फर्म मेसर्स बाज लेबोरेट्री से दवा खरीद की गई है, जो काफी समय से प्रतिबंधित है। गौरतलब है कि सीएजी की आॅडिट टीम ने वित्तीय वर्ष 2011 से 2016 तक की ड्राफ्ट आॅडिट रिपोर्ट में मैसर्स बाज लैबोरेट्रीज, कानपुर से आयुष मेडिसिन का क्रय अधिकृत नहीं होने का उल्लेख किया है। इतना ही नहीं, दवा की मांग भी मार्च के अंतिम हफ्ते में करने पर आॅडिट टीम ने कड़ी आपत्ति जताई है। कुल मिलाकर मार्च के अंतिम सप्ताह में ही बड़ा घालमेल किया गया है।

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