ईस्ट इंडिया कम्पनी के जमाने की बात है. साह गोपालदास ने पक्कामहाल में एक मुहल्ला बसाया था, जिसे आज भी गोपालदास लेन के नाम से जाना जाता है. उनके लड़के साह मनोहरदास ने अपार धन कमाया. अंग्रेजी फौज को रसद सप्लाई कर वह इतना अधिक धन कमाए कि बाद में ईस्ट इंडिया कम्पनी के भी खजांची बने. मनोहरलाल के पुत्र थे साह मुकुंदलाल, जो बहुत बड़े मूडी होने के कारण झक्कड़ साह के नाम से प्रसिद्ध हुए.

झक्कड़ साह के जमाने में छत पर धूप में अशरफियों को सुखाने का सिलसिला शुरू हुआ, जो कई वर्षों तक चला. अशर्फियों को नौकर ही छत पर सुखाते थे. शाम को तौल होने पर अशरफी घटती नहीं थी, तो नौकरों को डांट पड़ती थी कि उन लोगों ने ठीक से नहीं सुखाया.

झक्कड़ साह प्राय: ठठेरीबाजार वाले मकान की खिड़की में बैठकर गली में आने-जाने वाले लोगों को देखा करते थे. उन्हें जो व्यक्ति जंच जाता था कि यह ठाट-बाट के साथ कहीं जा रहा है, तो उसके ऊपर पान खाकर थूक देते थे. पान थूकते ही वह व्यक्ति आग-बबूला हो उठता था. इस बीच नौकर गली में दौड़कर जाते थे और उस व्यक्ति को मनाकर बैठक में लाते थे. उसे नहलाया, धुलाया और जलपान कराया जाता था. तत्पश्चात नया कपड़ा, सिल्क का दुपट्टा और एक अशरफी देकर उसे विदा किया जाता था.

इस घटना की चर्चा होने पर कई लोग अशरफी की लालच में सज-धज कर ऐसे भी गली में चक्कर मारा करते थे. किन्तु वे उसी के ऊपर थूकते थे, जो उन्हें जंच जाता था. हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्कार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रईसी की भी खूब चर्चा होती है. झक्कड़ साह के वंशज श्री श्री प्रकाश जी भी थे, जो बाद में बम्बई और मद्रास के राज्यपाल भी हुए.

#आधुनिक रईस….!!
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काशी को संवारने, चमकाने व विकास करने के लिए आधुनिक रईसों ने वाराणसी-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर हजारों आम, नीम, महुआ, पीपल, पाकड़, बरगद, शीशम आदि के देशज पौधों को कटवा दिया. और उनकी जगह खजूर व ताड़ प्रजाति के बड़े-बड़े पौधे लगवा दिए. जिससे न तो राहगीरों को छाया मिल सकती है और न ही परिंदे उस पर अपना घोंसला ही बना सकते हैं. यही नहीं सड़क चौड़ीकरण के लिए हजारों मकान तोड़ दिए गए.

इसके साथ ही पक्कामहाल के सौन्दर्यीकरण के लिए विश्वनाथ मंदिर के पास मकान व मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया. गंगापाथ-वे बनाने की योजना है, जिसके लिए 167 मकानों को तोड़ने की योजना है. इसके विरोध में क्षेत्रीय नागरिक धरोहर बचाओ आन्दोलन चला रहे हैं. सफाई कर्मियों की झुग्गी-झोपड़ी व पटरी व्यवसायियों को भी हटाने की नोटिस दे दी गई है. अब सफाई का काम प्राइवेट कम्पनीयों के हवाले कर दिया गया है. गंगा में भी प्राइवेट कम्पनियों को नाव चलाने की परमिट दी जा रही है. जिसका सीधा असर यहां के मल्लाहों पर पड़ेगा. सांड़ों को भी पकड़कर शहर के बाहर भेजा जा रहा है, ताकि बाहर से आने वाले विशिष्ट अतिथियों को असुविधा न हो.

धरोहर बचाओ समिति की तरफ से 21 मार्च, 2018 को आयोजित परिचर्चा की अध्यक्षता करते हुए बीएचयू के प्रोफेसर सुधांशु शेखर ने कहा कि यह विकास नहीं विनाश है. और काशी की प्राचीन पहचान, सभ्यता व संस्कृति को नष्ट करने की साजिश है. गलियां यहां की पहचान हैं और उसे ही देखने के लिए देश-विदेश के पर्यटक आते हैं. कचरा महोत्सव आधुनिक रईसी का प्रतीक है. अब तो गोबर, कचरा और पकौड़ा उद्योग की बहार है. शिक्षण संस्थान भी आजाद हो गए हैं.

वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप सिंह के फेसबुक वाल से…

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