वाराणसी। मुन्ना बजरंगी उन अपराधियों में था जो मौत को सीधे मात दे चुके थे। दरअसल एसटीएफ ने 1998 में बजरंगी को प्रदेश की दिल्ली से सटे इलाके में घेर लिया था। अपने साथी के संग जा रहे बजरंगी ने खतरा भातरे हुए फायरिंग शुरू कर दी। जबाव में एसटीएफ की तरफ से कई राउंड गोली चलायी गयी थी। गोली लगने के बाद बजरंगी वहीं गिर गया। अल सुबह हुई मुठभेड़ के दौरान खासी भीड़ जुट गयी थी। एसटीएफ ने बजरंगी को अस्पताल पहुंचाया जहां कई दिनों तक संघर्ष के बाद उसने मौत को मात दे दी थी। बजरंगी का आतंक कई राज्यों तक फैला था लेकिन पिछले ढाई साल से विरोधियों ने चुन-चुन कर उसके करीबियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। पहले साले और सबसे विश्वासपात्र पुष्पजीत उर्फ पीजे की हत्या की गयी। इसके बाद दूूसरे लेफ्टीनेंट तारिक को मौत की नींद सुला दिया गया। बजरंगी इससे उबर पाता इससे पहले वह खत्म कर दिया गया।

एसटीएफ से जता रहा था खतरा

एक बार भले एसटीएफ से बजरंगी बच गया था लेकिन उसे इसी से खतरा लगता था। मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह ने दो हफ्ते पहले ही बाकायदा लखनऊ में प्रेस कांफे्रस कर हत्या की आशंका जताई थी। सीमा का साफ आरोप था कि झांसी जेल में निरुद्ध माफिया मुन्ना बजरंगी का एनकाउंटर करने का षंड्यंत्र रचा जा रहा है। अलबत्ता इसके लिए विरोधियों के बजाय एसटीएफ के एक आला अफसर पर इस साजिश में शामिल होने की आशंका जतायी थी। सीमा का दावा था कि इसी अधिकारी के इशारे पर झांसी जेल में बजरंगी को खाने में जहर देने की कोशिश तक की गई। सीमा के आरोपों से इतर बजरंगी जेल में मारा गया लेकिन एसटीएफ नहीं बल्कि विरोधी की गोली के चलते।

आरोपों के दायरे में सुनील राठी

बजरंगी भले पूर्वांचल का माफिया डान था लेकिन पश्चिम उत्तर प्रदेश में भी उसकी खासी हनक थी। आरोप तो यहां तक थे कि दिल्ली पुलिस के एनकाउंटर स्पेशलिस्ट राजबीर सिंह की हत्या भी बजरंगी ने की थी। पश्चिम उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली कई माफिया गिरोह से बजरंगी की ठन चुकी थी। हत्या के बाबत आशंका जतायी जा रही है कि सुनील राठी ने अपने गुर्गों के जरिये इसे अंजाम दिलाया है। इससे पहले विकासनगर में पुष्पजीत सिंह व गोमतीनगर में हुए तारिक हत्याकांड खुले में हुए थे लेकिन जेल के भीतर की वारदात से दूसरे माफिया भी सहम गये हैं।

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