वाराणसी। अपने प्राचीन ज्ञान के चलते किसी समय भारत को ‘विश्वगुरू’ माना जाता था। मौजूदा दौर में वह अपनी इस विशिष्टता को भूला कर आधुनिकता की राह पर पर चल दिया है। उसे अपने मूल से जुड़े रहने की जरूरत है क्योंकि भारतीय ज्ञान और परंपरा में आज भी वो सामर्थ्य है जिससे वह समूचे विश्व को शांति पथ पर ला सकता है। केंद्रीय तिब्बती उच्च शिक्षा संस्थान की स्वर्ण जयंती पर रविवार को आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी भारतीय दार्शनिक प्रस्थानों एवं आधुनिक विज्ञान में मन की अवधारणा के समापन सत्र में तिब्बती धर्मगुरू परम पावन दलाई लामा देश् की प्राचीन विरासत को लेकर अपनी भावना व्यक्त की। दलाई लामा का मानना था कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में यह क्षमता है कि वह समूचे संसार को अपने प्राचीन ज्ञान से नई दिशा दे सकता है। भोगवादी समाज के विस्तार से आज संपूर्ण मानव समुदाय के समझ कई अनसुलझी समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। भारत के प्राचीन ज्ञान में इतना सामर्थ्य है कि वह पूरी दुनिया की समस्याओं का समाधान कर सकता है।

कबूतर उड़ाने से नहीं आती शांति

विदेश नीति पर इशारों में परम पावन ने टिप्पणी करते हुए कहा कि लोग कबूतर उड़ाकर शांति का संदेश देते हैं लेकिन मैं नहीं मानता कि कबूतर उड़ान शांति की स्थापना हो सकती है। हम शांति स्थापित करना चाहते हैं तो पहले आंतरिक शांति स्थापित करनी होगी। पहले जानवर इंसान को मारता था तो वो खबर बनती थी, लेकिन दुखद है कि आज इंसान ही इंसान को मार रहा है और हम इसे गंभीरता से नहीं ले रहे। ये भयावह है। ऐसे विध्वंसकारी भावनाओं पर काबू पाने की जरूरत है। हमें ऐसी मानसिकता को बदलना होगा। ये सिर्फ भारतीय ज्ञान परंपरा से ही संभव है।

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