भगतसिंह एक ऐसे क्रांतिकामी (क्रांति की कामना करने वाले ) थे, जो अपने अल्प जीवन काल मे निरंतर मुकम्मल क्रांति की राह तलाशते रहे और ऐसा प्रतीत होता है कि अपने जेल प्रवास के दौरान किये गये गहन अध्ययन, चितंन , मनन और संगत के जरिये वे क्रांति की राह तलाशने मे प्रायः सफल हो चुके थे।
ऐसी ही असीम संभावना उन्हे भारत की आसन्न क्रांति के संभावित महानायक के रूप मे प्रतिष्ठित करती है ।

भगत सिंह अपने जीवन को निरंतर सुधारने के साथ ही सामाजिक समझ को भी निखारते रहे, इस निरंतर होने वाले परिवर्तन के बावजूद चाहे वे आर्यसमाजी हों, मार्क्सवादी हों या फिर नास्तिक हों – उन्होने जनता के सरोकार को कभी नही विस्मृत किया।उम्र मे कम होने के बावजूद उनकी समझ जितनी विकसित थी, वह पूरी तरह से स्पष्ट थी, इतनी स्पष्टता भारत के संस्थागत साम्यवादियों और समाजवादियो के पास नही थी।

अपने जेल प्रवास के दौरान उन्होने व्यक्तिगत आतंकवाद को पूरी तरह से नकार दिया और जनआंदोलन आधारित क्रांतिकारी बगावत की राह तलाशने मे मशगूल रहे।
अपनी सारी जिंदगी व्यक्तिगत हिंसा मे गुजारने के बावजूद उन्होने किसान, मजदूर और युवा वर्ग की सूक्ष्म शक्ति को पहचाना और उनके वर्ग हित के लिये आंदोलन और बगावत की तमन्ना लिये शहीद हो गये।

भगत सिंह की इस तमन्ना को क्रमशः स्वामी सहजानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने भरसक पूरा किया।
भगत सिंह हलचल के प्रतीक थे, स्वामी सहजानंद उग्र आंदोलन के प्रतीक थे और नेताजी सुभाष चंद्र बोस बगावत के प्रतीक थे। भारत में यदि कभी क्रांति होगी तो वह क्रांति इन तीनो के जीवन संघर्ष के सफलताओं, असफलताओ , उनके कारण और उनके सुधार के रास्ते ही होगी । यह ध्रुव – सत्य है ।

भगत सिंह निःसंदेह, भारत के राजनैतिक मंच के एक चमकता सितारा हैं। उनकी फांसी ने , जनता मे वह जनज्वार पैदा किया जिसके प्रतिघात से ब्रिटिश साम्राज्य चरमरा गया… ।।।

मिट्टी की मोहब्बत में
हम आशुफतां सराने
वह कर्ज भी उतारें हैं
जो वाजिब भी नही थे . . .

## नमन ##

स्वामी सहजानंद मिशन स्कूल के निदेशक मंजीत शर्मा के फेसबुक वाल से…  

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