लखनऊ। अंग्रेजों की जमाने की जेल फतेहगढ़ में अफसर जाना नहीं चाहते। यदि किसी का ट्रांसफर हो जाये तो ज्वाइंन करने के बदले आदेश को बदवाने का फिराक में जुट जाता है। वजह, कस्बाई इलाके की खासी बड़ी जेल में कुख्यात भेजे जाते हैं जबकि स्टाफ की कमी बराबर बनी रहती है। बागपत जेल में माफिया डान मुन्ना बजरंगी की हत्या के बाद आरोपित सुनील राठी को यहां भेजा गया तो अफसरों की खासी कमी थी। शासन को इसकी भनक मिली तो उसने तेवर सख्त कर लिये। सूत्रों की माने तो अफसरों को संकेत दे दिये गये कि ज्वाइंग न होने की हालत में कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। नतीजा, फटाफट ज्वाइनिंग की नहीं हुई बल्कि जो देर-सबेर लौटते थे वह समय से पहले पहुंच गये।

दो जेलरों और एक डिप्टी ने कार्यभार संभाला

फतेहगढ़ सेन्ट्रल जेल में दो जेलर जिनकी पोस्ंिटग 30 मई को हुई थी वह डेढ़ महीने तक ज्वाइन ही नहीं किये थे। शासन का रुख भांप कर बुलंदशहर से यहां भेजे गये प्रमोद कुमार सिंह ने 14 को जबकि जौनपुर से तबादला किये गये सुरेशचंद्र ने 16 जुलाई को ज्वाइन कर लिया। इसके अलावा इन्हीं के साथ स्थानांतरित हुए डिप्टी जेलर धीरेन्द्र कुमार सिंह ने मऊ से आकर 18 जुलाई को कार्यभार ग्रहण कर लिया। शासन ने प्रभारी वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीपी त्रिपाठी को अवकाश से बुला कर ज्वाइन 17 की सुबह ही कार्यभार संभालने के निर्देश दिये जिसका उन्होंने 10 बजे तक अनुपालन कर लिया।

जौनपुर कनेक्शन जांच की जद में!

सुनील राठी के आने से पहले प्रभारी वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीपी त्रिपाठी छुट्टी पर चले गये थे। उनका डीआईजी पद पर प्रमोशन हो चुका है लेकिन तैनाती न होने से पूर्ववत बने हैं। उनके जाने पर जिला जेल के अधीक्षक विजय विक्रम सिंह को प्रभारी सौंपा गया। विजय विक्रम मूल रूप से जौनपुर के रहने वाले हैं और बजरंगी से लेकर आरोपों के दायरे में आने वाले पूर्व सांसद धनंजय भी वहां के। सूत्रों की माने तो यहीं कारण था कि अस्थायी कार्यभार देखने वाले पर ‘नजर’ रखी जा रही थी। पहले तो एडीजी के निर्देश पर बिना मांगे गनर भेजा गया जिससे गतिविधियों पर नजर रहे। यहीं नहीं व्हाट्सएप तक की पड़ताल की जा रही थी। बहरहाल उन्होंने सख्ती दिखाते हुए जो मानक तय किये वह अब भी जारी हैं लेकिन शासन अब भी नजर रखे है।

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