फार्मूला ही नहीं एजेंडा भी ‘गुजरात’ का, बदले है किरदार-नाम और काम के तौर तरीके

लखनऊ। पिछले पांच सालों से केन्द्र की सत्ता से दूर कांग्रेस ने राहुल के नेतृत्व में काम-काज का तरीका बदला है। लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश को लेकर जो परिदृश्य दिख रहा है वह पुराना फार्मूला नये रूप में सरीखा है। यह बात दीगर हैै कि किरदार के साथ ‘डायलाग’ बदल गये हैं। दरअसल गुजरात के विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने वहां के तीन ‘युवाओं’ से मुलाकात की थी। हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाती। तीनों ने कांग्रेस के साथ चुनाव नहीं लड़ा लेकिन दो साल के भीतर कांग्रेस में शमिल ही नहीं हुए बल्कि समूचा खेल सामने आ गया।

यूपी में भी वहीं बयान और वैसा ही अंदाज

लोकसभा चुनाव में प्रदेश की जिम्मेदारी संभालने के बाद प्रियंका ने भी कुछ उसी तरह से भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर से मुलाकात की। जिस तरह राहुल का कहना था कि वह नौजवानों के जोश-जब्बे का सम्मान करने आये हैं कुछ वहीं डायलाग प्रियंका की तरफ से रहा। यहीं नहीं उस समय गुजरात की तिकड़ी ने कांग्रेस से दूरी बनाने और अपने लोगों की खातिर संघर्ष जारी रखने का एलान किया था। हार्दिक तो यहां तक कह गये थे कि किसी दल में शामिल हुए तो … से मारना।

भीम आर्मी की तरफ से भी वहीं बयान

भीम आर्मी की तरफ से चंद्रशेखर ने तो सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा लेकिन इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष विनय रतन सिंह ने कहा कि कांग्रेस ने दलितों े लिए कुछ नहीं किया था। अलबत्ता मोदी के लिए चंद्रशेखर के चुनाव लड़ने पर सपा-बसपा से समर्थन की मांग जरूर कर दी। मायवती और अखिलेश पर सीधा हमला करने के बदले इशारों में जरूर कह डाला कि दलित समाज का इनसे भला नहीं होने वाला। माना जा रहा है कि भीम आर्मी अपने नेता चंद्रशेखर को मायावती से कम नहीं आंक रही है और परोक्ष रूप से कांग्रेस के एजेंड के अनरूप दलित वोटों में सेंध लगायी जा रही है।

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