वाराणसी। जिस महीने में सूर्य संक्रान्ति न हो, वह महीना अधिमास होता है। अधिमास 32 महीने, 16 दिन और 4 घटी के अन्तर से आया करता है। लोक व्यवहार में अधिमास के ‘अधिक मास’, ‘मलमास’, ‘मलिम्लुच मास’ और ‘पुरुषोत्तममास’ सरीखे नाम विख्यात है। चैत्रादि 12 महीनों में वरुण, सूर्य,भानु, तपन, चण्ड, रवि, गभस्ति, अर्यमा, हिरण्यरेता,दिवाकर, मित्र और विष्णु ये 12 सूर्य होते हैं और अधिमास इनसे पृथक रह जाता है। इस कारण यह मलिम्लुच मास कहलाता है। इस वर्ष ज्येष्ठमास मे ही अधिमास लग रहा है जो 16 मई से 13 जून तक है। अधिमास में फल- प्राप्ति की कामना से किये जाने वाले प्राय: सभी काम वर्जित हैं और फल की आशा से रहित होकर करने के आवश्यक सब काम किए जा सकते हैं।

बीएचयू के शोधछात्र की सलाह, क्या करे और क्या नहीं

बीएचयू के ज्योतिष विभाग के शोध छात्र पं गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक कुएं, बावली, तालाब की बोरिंग और बाग आदि का आरंभ और प्रतिष्ठा; किसी भी प्रकार और किसी भी प्रयोजन के व्रतों का आरंभ और (उद्यापन), नवविवाहिता वधू का प्रवेशइस अवथि में वर्जित है। पृथ्वी, हिरण्य और तुला आदि के महादान, सोमयज्ञ और अष्टका श्राद्ध ( जिसके करने से पितृगण प्रसन्न हो) गौका यथोचित दान, आग्रयण ( यज्ञ विशेष नवीन अन्न से किये जाने वाला यज्ञ) यह वर्षा ऋतु में ‘सावां से, शरद् में चावलों से और वसन्त में जौ से किया जाता है) उपाकर्म ( श्रावणी पूर्णिमा को ऋषि पूजन) वेदव्रत( वेदाध्ययन का आरंभ) अकिपन्न( बालकों के नियतराल में न किए हुए संस्कार); देवप्रतिष्ठा, मंत्र दीक्षा, यज्ञोपवीत संस्कार; विवाह मुण्डन, पहले कभी न देखे हुए देव तीर्थों का निरीक्षण, संन्यास, अग्निपरिग्रह(अग्नि का स्थायी स्थापन); राजा के दर्शन, अभिषेक, प्रथम यात्रा, चातुमार्सीय व्रतों का प्रथमारम्भ, कर्णवेध ये सब काम अधिमास में सर्वथा वर्जित हैं। इनके अतिरिक्त तीव्र ज्वरादि प्राणघातक रोगादि की रुद्र जपादि अनुष्ठान; कपिल षष्ठी- जैसे अलभ्य योगों के प्रयोग; अनावृष्टि के अवसर में वर्षा कराने के पुरश्चरण; वषट्कारवर्जित आहुतियों का हवन, ग्रहण सम्बन्धी श्राद्ध,दान, और जपादि; पुत्र जन्म के कृत्य और पितृमरण के श्राद्धादि तथा गभार्धान, पुंसवन, और सीमन्त जैसे संस्कार और नियत अवधि में समाप्त करने के पूर्वागत प्रयोगादि किये जा सकते हैं।

ईश्वर को लेकर जो करें उसका फल अक्षय

इस महीने में केवल ईश्वर के उद्देश्य से जो व्रत किये जाते हैं, उनका अक्षय फल होता है और व्रती के सम्पूर्ण अनिष्ट नष्ट हो जाते हैं। व्रत के विषय में श्रीकृष्ण ने कहा था कि इसका फलदाता, भोक्ता और अधिष्ठाता- सब कुछ मै हूँ। इसी कारण से इसका नाम पुरुषोत्तम है। इस महीने में दान, पुण्य या शरीर-शोषण जो भी किया जाय, उसका अक्षय फल होता है। यदि सामर्थ्य न हो तो ब्राह्मण और साधुओं की सेवा सर्वोत्तम है। इससे तीर्थस्नानादि के समान फल होता है। पुण्य कामों में व्यय करने से धन क्षीण नहीं होता, बल्कि बढ़ता है। विल्वपत्र से शिवपूजन, तथा नैमित्तिक पार्थिवार्चन, काशी में दशाश्वमेधघाटपर स्नान या अन्यत्र नदी में 10 दिनों तक स्नान, वृद्धि क्रम से गंगा स्त्रोत का नित्य पाठ आदि करना चाहिए। जिस प्रकार अणुमात्र बीज के दान करने से वट वैसा दीर्घजीवी महान वृक्ष होता है, वैसे ही मलमास में दिया हुआ दान अधिक फल देता है।

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