काशी का ‘देव दीपावली’ महोत्सव पर इस साल बनेंगे कई रिकार्ड

वाराणसी। कार्तिक पूर्णिमा को देव दीपावली कहते हैं जो इस वर्ष मंगलवार 12 नवम्बर को मनायी जायेगी। इसको ब्रह्मा,विष्णु,शिव,अंगिरा,और आदित्य आदि ने महापुनीत पर्व प्रमाणित किया है। अत: इसमें किये हुए स्नान,दान,होम यज्ञ और उपासना आदि का अनन्त फल मिलता है। इसी दिन सायं काल के समय मत्स्यावतार हुआ था। इस कारण इसमें दिए हुए दानादि का दस यज्ञों के समान फल होता है। इस बार काशी में देव दीपावली पर 11 लाख दिये जलाने की योजना को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसके साथ ही यह एक नया रिकार्ड बनेगा क्योंकि एक साथ इतने दीप पहले कहीं नहीं जले हैं।

आमजन की बढ़ती जा रही भागेदारी

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोधछात्र पं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक स्कन्दपुराण के काशीखण्ड के अनुसार यदि इस दिन कृत्तिका में स्वामी(कार्तिकेय) का दर्शन किया जाय तो ब्राह्मण सात जन्म तक वेदपारग और धनवान होता है। ब्रह्मा पुराण के अनुसार इस दिन चन्द्रोदय के समय शिवा, सम्भूति,प्रीति,संतति,अनसूया,और क्षमा- इन छ: तपस्विनी कृत्तिकाओं का पूजन करे क्योंकि ये स्वामिकार्तिक की माता हैं। कार्तिकेय खंगी(शिवा) वरुण, हुताशन, और बालियुक्त धान्य ये सायंकाल द्वार के ऊपर शोभित करने योग्य है। अत: इनका उत्कृष्ट गन्ध-पुष्पादि से पूजन करें तो शौर्य, वीर्यादि, धैर्य बढ़ते हैं। जो व्यक्ति पूरे कार्तिक मास स्नान करते हैं उनका नियम कार्तिक पूर्णिमा को पूरा हो जाता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन प्राय: श्रीसत्यनारायणव्रत की तथा सुनी जाती है। सायं काल देव मन्दिरों,चौराहों, गलियों पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाये जाते हैं और गंगा जी को दीपदान किया जाता है। काशी में यह तिथि देव दीपावली महोत्सव के रूप मे मनायी जाती है।

ऊवदेशों तक हैं इसकी ख्याति

मत्स्यपुराण के अनुसार कार्तिकी को नक्तव्रत करके वृष दान करे तो शिवपद प्राप्त होता है। यदि गौ,गज, रथ, अश्व,और घृतादि का दान किया जाय तो सम्पत्ति बढ़ती है। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिकी को उपवास सहित हरिस्मरण करे तो अग्निष्टोम के समान फल होकर सूर्य लोक की प्राप्ति होती है। कार्तिकी को सुवर्णमय भेड़ का दान करे तो ग्रह योग के कष्ट नष्ट हो जाते हैं। यह काशी का पर्व आज राष्ट्रीय पर्व का स्वरूप ग्रहण कर चुका है।

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