वाराणसी। विधानसभा चुनाव में भाजपा की प्रचंड जीत के दूसरे साइड इफेक्ट देखने को मिल रहे हैं। आने वाले पांच साल तक सरकार को ध्यान में रखते हुए बड़ी संख्या में नेता पाला बदल की तैयारी में हैं। इनमें ब्लाक प्रमुख से एमएलसी तक शामिल हैं। दरअसल सभी को भय सता रहा है कि सपा के शासनकाल में चुनाव तो किसी तरह जीत लिया था लेकिन भाजपा की सरकार आने के बाद विरोधी अविश्वास प्रस्ताव लाकर कहीं हटा न दे। पहले से भाजपा में शामिल होने के बाद कम से कम इसका खतरा नहीं रहेगा। आने वाले कुछ समय में कई चौंकाने वाले नाम यदि भाजपाई हो जाते हैं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये।

 

पार्टी स्तर पर नहीं होते हैं स्थानीय चुनाव

ब्लाक प्रमुख स्तर के चुनाव पार्टी स्तर पर नहीं लड़े जाते हैं। चुनिंदा मतों को अपने पाले में करने वाला विजेता हो जाता है। इसमें कहीं न कहीं से धन बल और बाहुबल का सहारा लिया जाता है। इसमें किसी तरह की बाधा न आये इस खातिर खुद को सत्तारूढ़ दल का प्रत्याशी घोषित कर दिया जाता है। यही कारण है कि पिछले ब्लाक प्रमुख चुनाव में सपा ने अपने छह प्रत्याशी जीतने का दावा किया था। इनमें सैयदराजा के भाजपा विधायक की भयोह और पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष सुजीत सिंह डाक्टर की पत्नी इंदू सिंह भी शामिल थी। भाजपा का दामन थामने वाला एक भी प्रत्याशी नहीं था। नगर पंचायत में भी कुछ ऐसा चल रहा है जहा तीन माह बाद चुनाव होने हैं।

 

चंचल की राह कई अन्य भी

विधानसभा चुनाव से कुछ समय पहले ही गाजीपुर के एमएलसी विशाल सिंह उर्फ चंचल ने भाजपा का दामन थाम लिया था। इसके पीछे केंद्रीय मंत्री मनोज सिंहा की रणनीति बताई गई थी। चुनाव के दौरान मिर्जापुर-सोनभद्र की एमएलसी रामलली मिश्रा को भी सपा ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। उनके पति विधायक विजय मिश्रा का बसपा से छत्तीस का आंकड़ा है। ऐसे में माना जा रहा है कि वह विधान परिषद में भाजपा का समर्थन कर सकती हैं। इसी तरह जौनपुर से एमएलसी प्रिंशु सिंह ने निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव में जीत हासिल की थी। उन्हें पूर्व सांसद धनंजय सिंह का समर्थन हासिल था। बीजेपी की सरकार बनने के बाद ये कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रिंशु सिंह भी पार्टी का दामन थाम सकते हैं।

 

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