चार माह टूटेगी भगवान विष्णु की ‘नींद’, प्रबोधनी एकादशी जानिये महत्व और इसकी पूजन विधि

वाराणसी। यद्यपि भगवान क्षणभर भी सोते नही, फिर भी भक्तों की भावना ‘यथा देहे तथा देवे’ के अनुसार भगवान चार मास शयन करते हैं। भगवान विष्णु के क्षीरशयन के विषय में यह कथा प्रसिद्ध है कि भगवान ने भाद्रपद मास की शुक्ल एकादशी को महापराक्रमी शंखासुर नामक राक्षस को मारा था और उसके बाद थकावट दूर करने के लिए क्षीरसागर में जाकर सो गये। वहां चार मास तक सोते रहे और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जगे। इसी से इस एकादशी का नाम ‘देवोत्थापनी’ या ‘प्रबोधनी एकादशी पड़ गया जो इस वर्ष शुक्रवार 8 नवम्बर को पड़ रही है।

उपवास का विशेष महत्व

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोधछात्र ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र के मुताबिक इस दिन व्रत के रूप में उपवास करने का विशेष महत्व है। उपवास न कर सके तो एक समय फलाहार करना चाहिए और समय -नियमपूर्वक रहना चाहिए। एकादशी को भगवन्नाम जप- कीर्तन की विशेष महिमा है। कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवतप्राप्ति के लिए पूजा-पाठ, व्रत उपवास आदि किया जाता है। इस तिथि को रात्रि जागरण का विशेष महत्व है। रात्रि में भगवत्सम्बन्धी कीर्तन,वाद्य,नृत्य,और पुराणों का पाठ करना चाहिए। धूप,दीप,नैवेद्य,पुष्प,गन्ध,चन्दन,फल और अर्घ्य आदि से भगवान की पूजा करके घंटा, शंख,मृदंग आदि वाद्यों की मांगलिक ध्वनि तथा मंत्रों के जरिये भगवान से जागने की प्रार्थना करे।

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