समस्त विरोधी भावों के विलक्षण समन्वय की शिक्षा देते हैं भगवान शिव, महाशिवरात्रि पर्व का यही है संदेश

वाराणसी। भगवान शिव में अनुपम सामजस्य, अद्भुत समन्वय और उत्कृष्ट सद्भाव के दर्शन होते हैं। हमें उनसे शिक्षा ग्रहण कर विश्व-कल्याण के लिए महान कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए। यही उनके विवाह के प्रतीक माने जाने वाले परम पावन पर्व महाशिवरात्रि का मानव जाति के प्रति दिव्य संदेश है। भगवान शिव अर्धनारीश्वर होकर भी काम विजेता हैं। गृहस्थ होते हुए भी परम विरक्त हैं, हलाहल विष पान करने के कारण नीलकण्ठ होकर भी विष से अलिप्त हैं। ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी होकर भी उनसे विलग हैं। उग्र होते हुए भी सौम्य हैं, अकिंचन होते हुए भी सर्वेश्वर हैं, भयंकर विषधर नाग और सौम्य चन्द्रमा दोनों ही उनके आभूषण हैं, मस्तक में प्रलयकालीन अग्नि और सिर पर परम शीतल गंगाधारा उनका अनुपम श्रृंगार है। उनके यहां वृषभ और सिंह का तथा मयूर एवं सर्प का सहज वैर भुलाकर साथ-साथ क्रीड़ा करना समस्त विरोधी भावों के विलक्षण समन्वय की अद्भुत शिक्षा मिलती है।

गणित के शून्य की तरह देते फल

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोधछात्र ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र शिव की महिमा बताते हुए कहते हैं, उनका श्री विग्रह शिवलिंग ब्रह्माण्ड एवं निराकार ब्रह्म का प्रतीक होने के कारण सभी के लिए पूजनीय हैं। जिस प्रकार निराकार ब्रह्म रूप, रंग, आकार आदि से रहित होता है उसी प्रकार शिवलिंग भी है। जिस प्रकार गणित में शून्य कुछ न होते हुए भी सब कुछ होता है, किसी भी अंक के दाहिने होकर जिस प्रकार यह उस अंक का दस गुना मूल्य कर देता है, उसी प्रकार शिवलिंग की पूजा से शिव भी दाहिने (अनुकूल) होकर मनुष्य को अनन्त सुख- समृद्धि प्रदान करते हैं।

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