वाराणसी। विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल करने वाली भाजपा को सहयोगी दल आंख दिखाने से नहीं चूकते। सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी कहने को सहयोगी दल है लेकिन इसके मुखिया ओमप्रकाश राजभर किसी विपक्षी दल से अधिक सरकार की नीतियों से लेकर अधिकारियों की मुखालफत करते हैं। दूसरी तरफ संख्या बल में उनसे मजबूत केन्द्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल का रूख नरम रहता है। इसका इनाम भी उन्हें मिला है। उनके पति और पार्टी अपना दल (एस) के राष्ट्रीय अध्यक्ष आशीष पटेल को विधानसभा चुनाव में 11 वें प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतारा गया है। पर्दे के पीछे से आशीष भले सक्रिय रहे हो लेकिन राजनीति में इंट्री पहली बार मिल रही है। संख्या बल और राज्यसभा चुनाव परिणाम को देखते हुए आशीष की जीत तय मानी जा रही है।

काम नहीं आ सका दबाव

दूसरी तरफ सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर के हाथ इस चुनाव में कुछ नहीं लगा। राज्यसभा चुनाव में उनके विधायकों की क्रास वोटिंग को भाजपा ने गंभीरता से लिया था। चर्चाओं की माने तो ओमप्रकाश राजभर अपने पुत्र के लिए एमएलसी का टिकट चाह रहे थे। इसके लिए पिछले कुछ दिनों से उन्हें विवादित बयान देने से लेकर सार्वजनिक रूप से सीएम और सरकार की आलोचना शुरू कर दी थी। भाजपा ने दबाव मानने के बदले उन्हें संकेत दे दिये कि मर्यादा को तोड़ने के बाद कोई मांग नहीं पूरी होगी।

‘राजा’ से लेकर दलित वोट बैंक का ध्यान

भाजपा ने इस चुनाव में आशीष पटेल को मैदान में उतार कर स्पष्ट कर दिया कि पूर्वांचल उसके लिए कितना अहम है। राजा भैय्या के करीबी माने जाने वाले यशवंत सिंंह को टिकट देकर उन्हें साधने की कोशिश की तो दलित वोटों के लिए विद्यासागर सोनकर को प्रत्याशी बनाया। इसके साथ वैश्यों को लुभाने के लिए ‘भामाशाह’ अशोक धवन को मौका मिला तो संघ की पसंद विजय बहादुर पाठक उम्मीद्वार बन गये। क्रास वोटिंग करने वाले का बचाव से लेकर दूसरे मामले ओमप्रकाश के लिए भारी पड़ गये।

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