वाराणसी। नव वर्ष के मौके पर हमे विचार करना चाहिये कि क्या हमारा बीता साल संतोषजनक रहा? यदि नहीं तो हमें अपने भीतर सुधार करने चाहिये। परम पावन दलाई लामा ने केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान सारनाथ के स्वर्ण जयंती समारोह में सोमवार को कहा कि नव वर्ष के इस अवसर पर हमें अपनी काल संबंधी धारणा पर विचार करना चाहिए। वस्तुत: वर्ष महीनों का महीने-हफें का हफ्ते-दिनों का और दिन-घंटो और मिनटों का संयोजन है। इस न्याय से वर्ष का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। हमें प्राप्त होने वाला प्रत्येक क्षण नवीन है। इस नये क्षण का नये तरीके से अपने तथा मानवता के हित में सर्वथा सदुपयोग करना चाहिए। हम सभी वस्तुत: एक ही समय के सहयात्री हैं। हमारा सद्भाव और सदाचरण न केवल हमें लाभ पहुचाते हैं बल्कि इनका हमारे परिवार, समाज और देश पर भी प्रभाव पड़ता है।एक खुशहाल समाज और देश की रचना केवल इसी तरह संभव है।

पांच और पचास वर्ष की योजना पर करें विचार

इस मौके पर केन्द्रीय तिब्बती संस्थान के प्रमुख डा. लोबसंग सेग्ये ने कहा कि तिव्वती संस्कृति के संरक्षण व संवर्धन में संस्थान की उपलब्धियां उल्लेखनीय रही हैं। अब इसे पांच और पचास वर्ष की योजना पर काम करना चाहिये। इसमें वह क्षमता है जिससे नालंदा ज्ञान परपरा की पुर्नस्थापना कर बौद्ध धर्म के मूल उपदेशों की सम्पूर्ण विव में प्रचार कर सकता है। इन दिनों देश में मेक इन इंडिया पर काम चल रहा है। यह उपयुक्त मौका है जब भारत को अपने स्वर्णिम अतीत को याद कर सबसे सस्ते और व्यापक निर्यात पर अवश्य विचार करना चाहिये। यह एक ऐसिहासिक सत्य हा कि बौद्धकालीन भारत निर्यात, सीमा सुरक्षा, रचनात्मकता आंतरिक तथा बाह्य शांति आदि मामलों में अग्रणी था। परम पावन दलाई लामा संस्थान से दोपहर एक बजे बोधगया के लिए कार द्वारा रवाना हो गये। वे प्लेन की जगह कार से ही बोधगया गये हैं।

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