वाराणसी। आश्विन शुक्ल दशमी को श्रवण का संयोग होने से विजया दशमी होती है। ज्योतिर्निबंध मे लिखा है कि आश्विन शुक्ल दशमी के सायंकाल में तारा उदय होने के समय ‘विजयकाल’ रहता है। वह सब कामों को सिद्ध करता है। आश्विन शुक्ल दशमी पूर्वविद्धा निषिद्ध परविद्धा शुद्ध और श्रवण युक्त सूर्योदय व्यापिनी सर्वश्रेष्ठ होती है। जिसमें अपराह्न काल में दशमी तिथि की प्रधानता होती है। पूर्व दिन तिथि नवमी गुरुवार को 20-36 घट्यादि अर्थात दोपहर 2:32 बजे तक नवमी है। इसके बाद दशमी आ जाती है जो अपराह्न काल के कुछ भाग मे है तथा इसी दिनश्रवण नक्षत्र भी है। द्वितीय दिन तिथि दशमी शुक्रवार को दशमी 25/49 घट्यादि (दिन 4:39) तक है तथा दशमी तिथि की अपराह्न काल में पूर्ण व्याप्ति तथा सम्पूर्ण विजय लक्षण (विजय मुहूर्त दिन 1:54 से दिन 2:40) तक है। अत: इस वजह से 19 अक्टूबर को ही विजया दशमी मनानी चाहिए।

अपराजिता का होता है पूजन

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोध छात्र ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि इस दिन अपराजिता का पूजन किया जाता है। उसके लिए अक्षतादि के अष्टदल मृत्तिका की मूर्ति स्थापन: ‘ऊं अपराजितायै नम:’ इससे अपराजिता का, ( उसके दक्षिण भाग में) ‘ऊं क्रियाशक्त्यै नम:’ इससे जया का , (उसके वाम भाग में) ‘ऊँ उमायै नम: इससे विजया का स्थापन करके आवाहनादि पूजन करे और ‘चारुणा मुख पद्मेन विचित्रकनकोज्वला। जया देवि भवे भक्ता सर्व कामान ददातु में। काञ्चनेन विचित्रेण केयूरेण विभूषिता। जयप्रदा महामाया शिवाभावितमानसा। विजया च महाभागा ददातु विजयं मम। हारेण सुविचित्रेण भास्वत्कनकमेखला। अपराजिता रुद्ररता करोतु विजयं मम।’ इनसे जया-विजया और अपराजिता की प्रार्थना करके हरिद्रा से रंगे हुए वस्त्र में दूब और सरसों रखकर डोरा बनावें। फिर ‘सदापराजिते यस्मात्त्वं लतासूत्तमा स्मृता। सर्वकामार्थसिद्धयर्थं तस्मात्त्वां धारयाम्यहम। इस मंत्र से उसे अभिमंत्रित करके, ‘जयदे वरदे देवि दशम्यामपराजिते। धारयामि भुजे दक्षे जयलाभाभिवृद्धये’ से उक्त डोरे को दाहिने हाथ में धारण करें।

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