वाराणसी। काशी शिव की नगरी है। धार्मिक नगरी होने के नाते यहां राजनीति को लेकर भी कई मिथक चलते हैं। माना जाता है कि कोई यहां का महापौर बन जाये तो उसका राजनैतिक कौरियर समाप्त हो जाता है। ऐसा एक के नहीं बल्कि कइयों के साथ हुआ है। भाजना ने इसे तोड़ने की कोशिश की लेकिन उसे मुंह की खानी पड़ी। मेयर रह चुके कौशलेन्द्र सिंह को फूलपुर में प्रत्याशी बनाने के साथ समूचे काशी की अड़ियों पर चर्चा यही थी कि सीएम से लेकर पूरी पार्टी मिल कर एक व्यक्ति का राजनैतिक पुनर्वास करा पाती है या नहीं। सभी ने अपनी तरफ से प्रयास किये लेकिन जो पहले से परम्परा चल रही है वह बरकार रही।

खुद को सांसद मान कर बदल गया था व्यवहार

कौशलेन्द्र सिंह पिछले विधानसभा में मीरजापुर से लेकर वाराणसी तक एक टिकट के लिए मुनहार कर रहे थे। कहीं से सफलता नहीं मिली तो अपने पेट्रोलियम पदार्थ के कारोबार में नये सिरे से जुट गये थे। केन्द्र और प्रदेश में अपनी सरकार होने के चलते इसके विस्तार को पंख लग रहे थे। जातीय समीकरणों के तहत पार्टी ने पैराशूट उम्मीद्वार बना दिया। काशी से लेकर प्रयाग तक के लोगों का कहना था कि खुद को सांसद मानते हुए व्यवहार पूरी तरह से बदल गया था। उपचुनवों में सत्ताधारी दल की जीत को मानते हुए वह आसमान पर थे लेकिन नतीजों ने जमीन पर ला दिया।

हराने के लिए भी सक्रिय था खेमा

भाजपा की तरफ से कौशलेन्द्र को एक स्वजातीय नेता के मुकाबले खड़ा किया जा रहा था। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना था कि इससे भविष्य में होने वाली सौदेबाजी में ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जायेगा। इस नेता ने भी खतरे को भांपते हुए अपने लोगों को वोट गठबंधन को शिफ्ट करने में लगा दिया। दूसरी तरफ सीट के लिए दावेदारों ने भी बाहरी प्रत्याशी का विरोध जमकर किया। सूत्रों की माने तो ‘कद्दावर’ नेता के खेमे से लेकर विरोधी खेमा तक हराने में जुटे थे। परिणाम घोषित होने के बाद सपाई से अधिक इनके चेहरे खिले दिखे।

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