एक अच्छी तस्वीर वो है जो कोई बात पूरी कह जाए… पत्रकारिता की कक्षाओं के बाद पत्रकारिता के छोटे से जीवन में सिखाने वालों से यही सुना-सीखा. फोटो जर्नलिस्ट तो नहीं हूं मगर कैप्शन लिखने की कोशिशें करते रहता था. अमर उजाला में ठाकुर सुनील सिंह के साथ और हिन्दुस्तान में मंसूर चचा, विनय या दूसरे फोटो पत्रकारों के साथ. इस तस्वीर ने न जाने क्यों अटका लिया अपने साथ…इतना कि इसके असली मालिक को इसे शेयर करने से रोक दिया मैंने. इसके असली मालिक का नाम बाद में पहले बात…

तो…एक अच्छी तस्वीर वो है जो कोई बात पूरी कह जाए. हो सकता है कि अच्छी कल्पनाशक्ति वाले एक अच्छी तस्वीर पर ढेरों बातें कह पाएं लेकिन मुझे अटकाने वाली इस तस्वीर ने सिर्फ एक जोड़ी ख्याल ही पैदा किए…शायद इसलिए भी कि खुद को थोड़ा सूखा, थोड़ा बंजर महसूस करने लगा हूं अब. बहरहाल एक जोड़ी ख्याल में नया कुछ नहीं, एक अपनी गंगा का है और दूसरा खुद सा…

महादेव की जटाओं में अवतरण के बाद काशी में गंगा के प्रवेश की कहानी शायद सभी ने सुन रखी है. शूलटंकेश्वर पर महादेव ने त्रिशूल अड़ा दिया. गंगा के आगे-आगे चल रहे भगीरथ स्तब्ध रह गए, कलकल बहती चली आ रहीं गंगा भी ठिठक गईं. महादेव ने कहा कि यह मेरी नगरी है, मेरा आनंदकानन है. यहां आना है तो कुछ शर्तें हैं जिन्हें मानना ही होगा… भगीरथ ने हाथ जोड़े कहा कि प्रभु ये कौन सी लीला है. आप ही ने गंगा का वेग संभाला है, आप ही के कारण धरती को तारने के लिए गंगा का अवतरण संभव हो सका है… महादेव नहीं माने तो गंगा बिलख पड़ीं कि अगर आनंदकानन में घुसने ही नहीं देना था तो जटाओं में संभाला क्यों, वेग को रोका क्यों, ब्रह्मा के कमंडल से निकलकर अति वेगवति होकर सीधे पाताल में समा जाना था मुझे तो…

महादेव ने दोनों को टोका, बताया कि प्रवेश से मनाही किसी को नहीं है मगर दो शर्तें हैं जिन्हें माने भी शूलटंकेश्वर के शूल से पार पाना असंभव है. दोनों शर्तें थीं कि गंगा कभी काशी के घाट नहीं छोड़ेंगी और कभी उनके जलचर काशीवासियों को, महादेव के भक्तों को आक्रांत नहीं करेंगे… गंगा ने सहर्ष यह शर्तें मान लीं, महादेव ने त्रिशूल हटा लिया, भगीरथ ने चैन की सांस ली और गंगा की लहरें आनंदकानन की तरफ बढ़ चलीं…

युग बीत गए, गंगा दूसरी शर्त पर कायम है. मगर घाट न छोड़ने की पहली शर्त कहीं-कहीं प्रभावित होती दिखती है. बदलते मौसम, बेतहाशा प्रदूषण, रास्ता रोकते तमाम बांधों की वजह से पानी कम पड़ जाता है. गर्मियों में देवनदी कुछ घाटों से कई मीटर दूर निकल जाती है, लाचार-बेकल सी दिखती तो है मगर फिर भी काशी से मुंह नहीं मोड़ पाती…जैसे कि गंगा ने आनंदकानन के एक तीर पर ये लंगर डाल रखा है. वक्त की मार झेलता, चमक खोता, जंग खाता मगर फिर भी अड़ा हुआ ये लंगर महादेव को दिए गए गंगा के उस वचन को निभाने की कोशिश जैसा ही तो है न…।

जोड़ी का दूसरा ख्याल लगभग महीना भर पहले शेयर की हुई युवा रंगकर्मी और एक बेहतरीन इंसान Vyomesh Shukla की एक पोस्ट से जुड़ा हुआ है. व्योमेश ने विस्थापन के मोल पर चर्चा की है और इसके विलोम यानी संस्थापन को अनमोल बताया है… पिछले डेढ़ साल में विस्थापन के मोल और बेमोल संस्थापन को करीब से समझने का मौका मिला. ढेरों लोग मिले, ढेरों अनुभव भी…

दिल्ली के एक बड़े भारी संपादक से एक बार मिलने का सौभाग्य मिला था. उपलब्धियां क्या हैं उनकी पता नहीं, मगर बड़े भारी संपादक थे (हैं) क्योंकि राजधानी में बैठते हैं. उनके कार्यालय में सेंट्रल एसी होता है (वैसे तो अब हमारे कार्यालय भी सेंट्रल एसी हैं), संडासों में हाथ धोने के लिए डेटॉल होता है, पोंछने को आरामकुर्सी के पीछे झक सफेद तौलिया होता है, बजाने को घंटी होती है (अगर मातहतों की बजाने का मन न हो तो), दूर सेंटरों पर बैठे संपादकों की बजाने को मोबाइल, लैंडलाइन, मेल और पीए होता/होती है, लिखने को संपादकीय होती है और उसकी गलतियां ठीक करने को केबिन के बाहर नंदी की तरह बैठे अधेड़ मगर उपसंपादक होते हैं… तो जब बड़े भारी संपादक से मिलने का ‘सौभाग्य’ मिला तो मैं खुद को सौभाग्यशाली समझ रहा था. मन में दबी सी इच्छा थी कि बड़े संपादक जी बड़ा सा ऑफर दे दें, खुद पर भरोसा था मगर बेटा-बेटा कहकर मुंडन करने वाले संपादक जी की इस विशिष्टता का भान भी था. विनम्रता के संस्कार मिले हैं तो झुकना जानता हूं, मगर कितना झुकना है यह भी तय कर रखा है. अड़ियल बचपन से हूं तो जलील होकर या बेमन के कोई काम नहीं कर सकता, भले ही उसके एवज में कितना भी बड़ा नुकसान क्यों न हो जाए…

संपादक जी रूबरू हुए, काफी देर तक बात भी हुई. सब ठीक था मगर मुझे बनारसी जानते ही दुम पर खड़े हो गए. संपादक जी का मानना था (जाहिर है उनके हिसाब से यही बह्म सत्य भी था) कि बनारसी बड़े बेहूदे होते हैं, बनारस छोड़ना नहीं चाहते, कम्फर्ट जोन से बाहर नहीं आना चाहते, डिस्गस्टिंग होते हैं इत्यादि इत्यादि. संपादक जी ने बताया कि बनारस का जाम तो बस उफ्फ, बनारस की गंदगी तो बस यक्क इसलिए बनारस के लोग तो बस छि:. बड़े संपादक थे इसलिए मैं चुपचाप सुनता रहा और कुछ देर बाद प्रणाम करके उठ गया. घटना तभी से मन में अजीब सी कुंडली मार के बैठी थी. व्योमेश जी की लेखनी ने इसे सोचने की दिशा दी.
ये संस्थापन जो कि बेमोल है, हमें एक हौसला देता है. एक दो कौड़ी का हौसला. ये दो कौड़ी का हौसला ही तो था जिसने जी-जी करने नहीं दिया. हां हम संस्थापित हैं, इसी लंगर की तरह गंगा तीरे पर अपना मन छोड़ दिया है, बाबा के त्रिशूल की तरह अड़ा दिया है इसे काशी के निकासद्वार पर, सब सही है मगर निकलने नहीं देंगे मन को यहां से. पर्यटन कर लेंगे, कुछ समय का विस्थापन भी सहा जा सकता है मगर बच्चे यहीं थे, यहीं बड़े हुए, यहीं अधेड़ होंगे और यहीं बूढ़े होकर मर जाएंगे, शान से निकलेंगे चार कंधों पर, जलेंगे यहीं हरिश्चंद्र या मणिकर्णिका पर… मगर मरने के बाद भी ये लंगर इसी आनंदकानन में अड़ा रहेगा. हमारे पास ये थाती है जिससे बाहर से आकर वो भी निस्वार्थ रूप से प्यार कर बैठते हैं जिन्होंने जीवन में निस्वार्थ का मतलब ही नहीं जाना…यही तो रजा बनारस है न!!!

अब तस्वीर के असली मालिक की बात…ये हैं अमन मंसूर आलम Aman Alam. कम उम्र के हैं मगर कमाल की होती हैं इनकी तस्वीरेंं. ऐसे ही चलते रहें-बढ़ते रहें, यही दुआ है…।

पोस्ट अगर किसी को भी दुख पहुंचाती हो तो उनसे क्षमायाचना के साथ…
– अभिषेक त्रिपाठी।

साभार – वरिष्ठ पत्रकार अभिषेक त्रिपाठी के फेसबुक वाल से…

admin

No Comments

Leave a Comment