वाराणसी। सम्राट बिस्मिल्लाह खां की विरासत संभालने वाले उनके बेटे जामिन हुसैन की सांसें शनिवार को थम गईं और उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी रुखसती के साथ ही बनारस में शहनाई का शोर थम गया। जामिन हुसैन पिछले कुछ सालों से बीमार थे। मधुमेह और अन्य बीमारियों के चलते, उनकी सेहत धीरे-धीरे गिरती जा रही थी। शनिवार की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली।

मोदी का प्रस्तावक बनने से किया था इंकार

जामिन हुसैन ने अपने पिता बिस्मिल्लाह खां की विरासत को संभाला था। पिता बिस्मिल्लाह खां की छांव में शहनाई के सुरों को समझा। अपने पिता की तरह जामिन भी ताउम्र संगीत साधना में लगे रहे। शहनाई के अलावा उन्हें कभी कुछ नहीं सूझा। बिस्मिल्ला खां के देहांत के बाद बीजेपी ने उन्हें नरेंद्र मोदी का प्रस्तावक बनने का प्रस्ताव दिया, लेकिन जामिन ने ये कहते हुए इंकार कर दिया कि उनका परिवार सिर्फ संगीत के लिए बना है।

शहनाई जगत में आया शून्य

जामिन के इंतकाल के बाद बनारस के शहनाई जगत में शून्य पैदा हो गया है। बिस्मिल्लाह खां के बाद जामिन ही शहनाई के सबसे बड़े कलाकार थे। उनकी मौत की खबर मिलते ही संगीत प्रेमी शोक में डूब गए। जामिन के साथ कई बार मंच साझा कर चुके तबला वादक अशोक पांडेय के मुताबिक बनारस के संगीत घराने के लिए एक बड़ी क्षति है। अशोक पांडेय ने बताया कि बीस दिन पहले ही चंडीगंढ़ में जामिन के साथ उन्होंने एक कार्यक्रम प्रस्तुत किया था। खराब सेहत के बावजूद जामिन ने कार्यक्रम में ऐसा शमां बांधा कि वहां मौजूद हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर भी जामिन के मुरीद बन गए।

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