वाराणसी। भाद्रपद शुक्ल षष्ठी को लोलार्क षष्ठी के नाम से जाना जाता है जो इस वर्ष शनिवार 15 सितम्बर को पड़ रही है। लोलार्क षष्ठी (ललई छठ) पर काशी स्थित लोलार्क कुंड पर स्नान करने से नि:संतान दंपति को पुत्र की प्राप्ति होती है। इस कुंड में स्नान कर अनेक दंपतियों ने पुत्र सुख पाया है। इस मान्यता के चलते हर साल लोलार्क छठ पर इस कुंड में डुबकी लगाने वालों की भारी भीड़ होती है। इस कुंड में स्नान करने वाले नि:संतान दंपति स्नान के बाद कपड़े कुंड में ही छोड़ देते हैं। इस दौरान महिलाएं श्रृंगार आदि की सामग्री भी वहीं छोड़ती हैं।

बीएचयू ज्योतिष विभाग के शोध छात्र ज्योतिषाचार्य पं गणेश प्रसाद मिश्र के अनुसार शिव भक्त विद्युन्माली दैत्य को जब सूर्य ने हरा दिया तब सूर्य पर क्रोधित हो भगवान रुद्र त्रिशूल हाथ में लेकर उनकी ओर दौड़े। उस समय सूर्य भागते-भागते पृथ्वी पर काशी में आकर गिरे, इसी से वहां उनका लोलार्क नाम पड़ा। सप्तमीप्रयुक्त भाद्रपद शुक्ल षष्ठी को स्नान, दान, जप और व्रत करने से अक्षय फल प्राप्त होता है। विशेषकर सूर्य का पूजन, गंगा का दर्शन और पंचगव्यप्राशन से अश्वमेध के समान फल होता है। पूजा में गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, और नैवेद्य मुख्य है।

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