वाराणसी। प्रदेश से राज्यसभा की 10 सीटों पर होने वाला उपचुनाव दिलचस्प मोड पर पहुंच गया है। भाजपा ने संख्या बल के आधार पर आठ प्रत्याशी घोषित किये थे लेकिन नामांकन के लिए नाटकीय ढंग से नरेश अग्रवाल को अपने पाले में करने के साथ सपा-बसपा की सांसत बढ़ा दी है। सपा,बसपा, कांग्रेस और रालोद का मिला कर जो वोट होता है वह दो सीटों पर जिताने के लिए काफी है। इसमें नरेश अग्रवाल के विधायक पुत्र का वोट निकाल दे तो एक सीट पर पराजय हो सकती है। ऐसे में निगाहें राजा भैया समेत तीन निर्दलीयों के साथ निषाद पार्टी के इकलौते विधायक विजय मिश्र पर टिकी है। विजय मिश्र ने राष्ट्रपति चुनाव में वोट भाजपा को दिया था लेकिन इस बार रुख कुछ बदला दिख रहा है।

उपेक्षा के चलते खिन्न है विजय मिश्र

पिछले एक साल में सदन से लेकर सार्वजिनक कार्यक्रमों में विजय मिश्र सत्ताधारी दल के साथ दिखते थे। बावजूद इसके शासन स्तर पर उनकी उपेक्षा की गयी। जन प्रतिनिधि होने के नाते लोग उनके पास पैरवी के लिए आते हैं लेकिन स्थानीय अधिकारी इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। उल्टे कई मामलों में दबाव बनाने की भी कोशिश की गयी। राज्यसभा चुनाव के बाबत पूछे जाने पर उनका सीधा उत्तर था कि किसी ने इसकी खातिर सम्पर्क नहीं किया। सत्तारुढ़ दल के प्रत्याशी के वोट देने को लेकर भी उन्होंने पत्ते नहीं खोले। अलबत्ता इतना जरूर कहा कि दशा यही रही तो वोट डालने भी नहीं जाउंगा।

मायावती-अखिलेश से है 36 का रिश्ता

चार बार से ज्ञानपुर सीट से जीत हासिल कर रहे विजय मिश्र ने पिछले चुनाव में साबित कर दिया था कि वह किसी पार्टी के मोहताज नहीं है। निषाद पार्टी जैसे क्षेत्रीय दल के टिकट पर भारी जीत उन्हें बाहुबली से जनबली की श्रेणी में खड़ा करता है। बावजूद इसके सपा की कमान संभाल रहे अखिलेश से लेकर मायावती से उनके रिश्ते ठीक नहीं हैं। बसपा के शासन काल में लंबे समय से फरारी काटने से लेकर जेल तक जाना पड़ा था।

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