वाराणसी। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास हो रहे ध्वस्तीकरण के विरोध में ज्योतिष एवं शारदा पीठ के जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती भी खुल कर मैदान में उतर आये हैं। उन्होंने धरोहर बचाओ समिति (काशी) को अपना आशीर्वचन दिया है। समिति के अध्यक्ष को भेजे पत्र में शंकराचार्य ने विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र में चल रहे विकास के नाम पर विध्वंस को काशी की पौराणिकता को खतरा बताया है। साथ ही शासन-प्रशासन को चेताया है कि यदि इस तरह का प्रयास जारी रहता है तो वे काशी के लोगों को आंदोलन के लिये प्रेरित करेंगे। शंकराचार्य का कहना है कि प्राचीन काल से ही काशी को मंदिरों का नगर कहा जाता है। इसके स्वरूप का संरक्षण धर्मनिरपेक्ष सरकार का कर्तव्य है। मंदिरों का सरकारीकरण कर उनसे मिलने वाले धन को शासन इनके संरक्षण में लगाए न कि उनका ध्वंस कर वहां से धन उगाहने का जरिया बनाये।

मुगलों व अंग्रेजों ने भी ऐसा नहीं किया था

नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) के श्रीपरमहंसी गंगा आश्रम से शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने धरोहर समिति के अध्यक्ष को भेजे पत्र में लिखा है कि अविमुक्तेश्वरानंद से समाचार मिला है कि काशी में मणिकर्णिका खंड के अंतर्गत काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास पुराणवर्णित अत्यंत प्राचीन देवालयों को तोड़ा जा रहा है। यह पूर्णत: अनुचित है। सर्वदेवमय काशी में शास्त्रोक्त सभी देवताओं का कहीं न कहीं स्थान अवस्थित है। उनका संरक्षण तथा पूजन-अर्चन होना चाहिए न कि विध्वंस। काशी के इतिहास में संभवत: यह अपूर्व घटना है। इस तरह देव प्रतिमाओं का विध्वंस मुगलों तथा अंग्रेजों के शासनकाल में भी नहीं हुआ।

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खत्म हो जायेगी काशी की समृद्धि

शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती का मानना है कि पुराणवर्णित और प्राण प्रतिष्ठित इन देव विग्रहों के अपमान से देवताओं के काशी छोड़ने का खतरा है। इस असर यह होगा कि काशी की समृद्धि, श्री तथा यश खत्म हो जाएगा। उनका मानना है कि ध्वस्त किये गये मंदिरों का पुनर्निर्माण हो तथा देवताओं के स्थानों को ना छेड़ा जाए। ऐसा नहीं हुआ तो वह खुद ही सभी काशीवासियों को आंदोलन के लिए प्रेरित करेंगे।

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