अब मजदूर है ही नहीं ! चौकीदार भी साहब हो गए। सब साहब ! अफसर !! मजदूर तो काम का समय 8 घंटे निर्धारित करने के लिए लड़े और लम्बी लड़ाई के बाद जीते। अब स्वेच्छा से 18 से 20 घंटे काम करने की आपस में ही स्पर्धा चल रही है। होड़ लगी है, वो जो मालिक से लड़ते थे, अब उसके पहरेदार और लठैत हो गए। वह भी खुशी-खुशी ! तो फिर वो मजदूर अपने को मानने को तैयार ही नहीं हैं। उन्हें अब ऐसा मानने में शर्म आती है। अब उनकी सोच बदल गई है, तो इसका असर तो पड़ेगा।

और जो बेरोजगार हैं वो खुशी से पकौड़ा, गोबर और कचरा उद्योग का जयकारा लगा रहे हैं। वो भी मालिक !! अब, हर-हर और घर-घर कर रहे हैं। यही उनकी आजादी है। टर्र-टर्र करने की !! इस आजादी में उन्हें आनन्द की अनुभूति हो रही है। अब विचार की जरूरत क्या है? उसकी मौत हो गई है। विचारविहीन आनन्द ! जिसे आप हुरपेटनवाद कह सकते हैं। सब एक दूसरे को हुरपेट रहे हैं। कोई दोस्तो-मितरों को, कोई सरकार को और जो अधिक सक्षम हैं वो बैंकों को !!

जी ! यही आज की सच्चाई है। और भगत जो गोशाला खोलकर अनुदान खा जा रहे हैं, वह ईश्वर की ही इच्छा है। गंगा प्रदूषित हैं, यह भी ईश्वर की इच्छा है। नीरव मोदी PNB को चुना लगाकर भाग गया, यह भी ईश्वर की इच्छा है। सब ईश्वर की इच्छा है, तो उसे ही करने दीजिए सब कुछ ! शासन-प्रशासन की क्या जरूरत है। जो ईश्वर की इच्छा होगी वह तो होगा ही !! यही है हुरपेटनवाद ! जरूरत पड़ने पर गणेशजी और भारतमाता को भी लपेटे में ले लीजिए। जैसे पक्कामहाल में होली से पूर्व हुआ था। अब भी समझ में न आए तो वरिष्ठ पत्रकार पद्मपति शर्मा और राजनाथ तिवारी से पूछ लीजिएगा। क्यों पद्मपति शर्मा ने अपनी fb पोस्ट पर घोषणा की थी आत्मदाह करने की? कभी उनसे मिले? उनका दर्द जानने के लिए !! उनका मोहभंग क्यों हुआ? वह भी तो उसी खेल के खिलाड़ी थे। वरिष्ठ खेल पत्रकार हैं, इसलिए आज जो राजनीतिक खेल चल रहा है, उसके दांव-पेंच को अच्छी तरह समझते हैं। वर्तमान परिवेश में उनसे भी मिलकर समझा जा सकता है।

संत अतुलानंद चौराहे (वाराणसी) पर लगाई गई गुस्साए सांड़ की प्रतिमा को हुरपेटनवाद के प्रतीक के रूप में रेखांकित कर सकते हैं। जिसकी परिणति त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा को तोड़कर की गई, अब इसकी उपयोगिता और सार्थकता के पक्ष में तर्क दिया जा रहा है। यह जीत का जश्न है।

अब यदि विदेश में गांधी की प्रतिमा गिराई जाएगी तो यही कहा जाएगा कि हमने गांधी को गोली मारी और वह प्रतिमा गिरा दिए तो क्या हुआ? किसी विदेशी ने नहीं बल्कि भारतीय ने ही गोली मारी थी गांधी को। इसमें भी दम है। वैचारिक स्तर पर हम शुद्धतावादी दर्शन के पक्ष में तर्क गढ़ रहे हैं। क्या विचार और दर्शन को किसी भौगोलिक सीमा में बांधा जा सकता है? मजे की बात यह है कि विचार तो हमें स्वदेशी चाहिए लेकिन विकास के लिए दुनिया के अनेक देशों से विदेशी निवेश करने की गुजारिश कर रहे हैं। इसमें कोई अंतरविरोध आप को नजर आ रहा है कि नहीं ? दरअसल यह भी हुरपेटनवाद की ही सोच है।

रेलवे, बीमा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सैनिक साजो-सामान की जरूरत, ऊर्जा आदि क्षेत्र में जितना विदेशी निवेश होगा उतना ही हम हुरपेटने में सक्षम होंगे। विदेशी पूंजी ही स्वदेशी पूंजी को हुरपेटने में सक्षम है। अमेरिका इराक, सीरिया, लिबिया, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, उत्तर कोरिया आदि देशों को हुरपेट रहा है। और जो ऐसा नहीं कर पा रहे हैं वह उसकी मदद कर रहे हैं। हम भी मौका मिलने पर पाकिस्तान को हुरपेट देते हैं। जैसे सर्जिकल स्ट्राइक हुई थी। इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसेन को अमेरिका, ब्रिटेन की सेनाओं ने मिलकर कैसे हुरपेटा, वह तो याद होगा ही।

दरअसल इस दर्शन के सामने हमेशा हुरपेटने के लिए एक लक्ष्य होना चाहिए। अपने लालकृष्ण आडवाणी हुरपेटनवाद के ऐसे शिकार हुए कि चुपचाप बैठे हैं। उन्हें देखकर लगता ही नहीं कि वो कभी बोलना भी जानते थे। तो 21वीं सदी में यह दर्शन अपने पूरे उफान पर पूरी दुनिया पर असर डाल रहा है। अब तो हमारी खेती-किसानी भी इसकी गिरफ्त में आ चुकी है।
वरिष्ठ पत्रकार सुरेश प्रताप सिंह के फेसबुक वाल से…

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