लखनऊ। सूबे की सत्ता में आने से पहले भाजपा सत्तारूढ़ सपा पर जो आरोप लगाती थी उसमें डीजीपी पद को लेकर भी तंज होता था। वरिष्ठता को नदंरदाज करना, ‘चहेते’ को बाहर से बुला कर कुर्सी सौंपने से लेकर दामन दागदार होने की टिप्पणी की जाती थी। अब वही आरोप खुद पर लग रहे हैं तो सफाई नहीं देते बन रहा है। सपा ने एक दिन भी कुर्सी को खाली नहीं रहने दिया था लेकिन केन्द्र और प्रदेश में एक ही पार्टी की सरकार होने के बावजूद तीन हफ्ते से अधिक समय तक किसी की नियुक्ति न होने अपने आप में बड़ा सवाल है। वैसे भी ओपी सिंह को जहां मुलायम सिंह का अत्यधिक करीबी बताया जाता है तो बसपा सुप्रीमो मायावती के संग हुए गेस्ट हाउस कांड में निलंबन का भी सामना करना पड़ा था।

काम आये दिल्ली के ‘रिश्ते’ या दूसरी कहानी

इससे पहले सुलखान सिंह को डीजीपी बनाते समय वरिष्ठता का वास्ता दिया गया था। इसी के चलते उन्हें एक बार और मौका दिया गा। बावजूद इसके 31 दिसंबर 2017 को रिटायर्ड होने के बाद जो नाम चर्चा में आये उसमे ंओपी सिंह कहीं नहीं थे। बताया जाता है कि केन्द्र के एक प्रभावशाली मंत्री ने उनका नाम आगे बढ़ाया था। ओपी सिंह केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर थे और बतौर सीआईएसएफ डीजी काम कर रहे थे। उपरी मन से योगी ने सहमति दे दी थी लेकिन महकमे से लेकर शीर्ष स्तर पर विरोध जमकर हो रहा था। वरिष्ठता की सूची में उनसे ऊपर 6 अधिकारी थे और कई का ट्रैक रिकार्ड खासा शानदार था। यहां पर एक बार फिर से दिल्ली की दखल काम आयी और आनन-फानन में नाम को फाइनल करने के संग रिलीव करने के आदेश दिये गये।

सतह पर आ सकता है असंतोष

यूं तो पुलिस अनुशासित महकमा है लेकिन इस निर्णय को लेकर आईपीएस लॉबी में भी खासा असंतोष है। सूत्रों की माने तो जल्द ही यह सतह पर भी आ सकता है। ओपी सिंह के बारे में एक और चर्चा है कि वह आईएएस लॉबी की पसंद थे। क्राइम मीटिंग को डीएम के अधीन करने को लेकर जिस तरह आईपीएस और पीपीएस लॉबी ने मुखर होकर विरोध किया था उसके बाद किसी ऐसे मुखिया को लाना था जो इस निर्णय को लागू करा सके। बताया जाता है कि इसके लिए आईएएस लाबी ने अपनी तरफ से प्रयास किे थे।

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