नई दिल्ली। भारत छोडो आंदोलन महात्मा गांधी द्वारा सन 1942 मे नही बल्कि इसका आगाज 19 मार्च सन 1940 को रामगढ सम्मेलन मे स्वामी सहजानंद सरस्वती तथा सुभाष चंद्र बोस के द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था। इसके पुख्ता प्रमाण हैं कि महात्मा गांधी की विलंबित शिरकत 9 अगस्त 1942 को हुई और वह भी बिना किसी कार्यक्रम के । अंग्रेजी राज का विरोध कैसे करना है , क्या करना है इस पर कोई कार्यक्रम नही दिया, बस एक प्रतिकात्मक नारा देकर इतिश्री कर लिया। बस प्रतीक के तौर पर गांधी गुट के कांग्रेसी जेल यात्रा किये। स्वंय जयप्रकाश नारायण कभी इस जेल तो कभी उस जेल की यात्रा करते रहे या फिर राजाओं की मेहमानवाजी स्वीकारते रहे। इस दौरान वे काशीराज, मझवा स्टेट, इत्यादि राजाओं के ही यहां बने रहे उल्टा एक समय ऐसा भी आया जब सुभाष चंद्र बोस ने जापान की सहायता से भारत के कुछ हिस्सो को अंग्रेजी राज से मुक्त कराया तब ऐसी स्थिति मे जयप्रकाश अंग्रेजो की तरफ से सुभाष चंद्र बोस से लोहा लेने को तैयार हो गये थे। इंडियन कौंसिल आॅॅफ हिस्टारिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के नेशनल सेमिनार में स्वामी सहजानंद शोध संस्थान के निदेशक एंव अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त लेखक राघव शरण शर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में प्रमाणों के आधार पर इसका दावा किया है।

फौज में बगावत देख अंग्रेजों ने पहले ही छोड़ा देश

सन 1942 का भारत छोडो आंदोलन एक व्यापक जन विद्रोह था जिसमे देश की जनता शासन करने वाले अंग्रेजो से लडी थी। देश के भीतर स्वामी सहजानंद ने किसानो, खेत मजदूरो को जगाकर एक व्यापक जन आंदोलन छेडा। दरअसल उससमय भी किसानों के बेटे ही फौज मे थे। इसका नतीजा था कि भारतीय फौज अंदर ही अंदर सुलगने लगी। सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने भारतीय फौज मे बगावत के बीज बो दिये थे और इससे प्रभावित होकर नौ सेना ने विद्रोह कर दिया। अंग्रेजो की विश्वसनीयता भारतीय फौज से जाती रही और उन्होने पहले से घोषित सन 1948 के बजाय आनन फानन मे हमें अगस्त 15 सन 1947 मे आजाद कर गये।

देश के चुनिंदा विद्वान पहुंचते हैं सेमिनार में

भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के इस वार्षिक संगोष्ठी मे देश के गिने चुने विद्वानों को ही शिरकत करने का मौका मिलता है। ऐसे मे उनके बीच मुख्य वक्ता के रूप में देना अपने आप मे ही एक विशेष सम्मान है। राघव शरण शर्मा अंतरराष्ट्रीय ख्याति के लेखक हैं जिनकी पु्स्तकें प्रकाशन विभाग से लेकर विदेशों के प्रकाशक भी प्रकाशित कर चुके हैं।

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