वाराणसी। मूल रूप से कानपुर के रहने वाले रईस बनारसी का अपराध से कोई लेना-देना नहीं था। बड़े भाई की वहां के कुख्यात अपराधी सोनू अलंगा ने हत्या कर दी तो परिवार पनाह लेने की खातिर खालिसपुरा (दशाश्वमेध) आ गया। यहां पर गुड्डू मामा सरीखे कुख्यातों का साथ पाकर वह जरायम जगत में घुसा। सबसे पहले फिल्मी तरीके से सोनू अलंगा को कानपुर कलेक्ट्रेट में गोली से छलनी कर दिया। वहां से भागने के बदले खड़ा रहा और खुद को एसओजी का बता कर गफलत में डाल दिया। सूत्रों की माने तो माफिया डान मुन्ना बजरंगी से लेकर कुख्यात मुन्नू तिवारी तक से रईस के करीबी संबंध थे। यही नहीं जिस राकेश की हत्या की उसके साथ भी मुंबई में खासा समय बिताया था।

अलग खड़ा कर लिया था गैंग

रईस काफी समय तक मुन्नू तिवारी से जुड़ा रहा। कहा जाता है कि उसके कहने पर नैनी जेल के बाहर सपा नेता समेत दो को गोली से उड़ा दिया था। बाद में किसी बात को लेकर मुन्नूू से रिश्ते बिगड़ गये। दावा तो यहां तक है कि झांसी जेल में माफिया डॉन मुन्ना बजरंगी से भी मुलाकातें थी लेकिन रिश्ते अधिक समय तक नहीं चल पाये। पिछले साल गुड्डू मामा की नाटकीय ढंग से गिरफ्तारी के बाद रईस खुद सरगना बन कर अपराध करने लगा। कानपुर से खासा धन मिल रहा था जिससे काशी में वारदातें नहीं की। अलबत्ता करीबी की हत्या का बदला लेने की खातिर आया लेकिन गोली का निशाना बन गया।

पुलिस ने ली राहत की सांस

रईस का खात्मा जिस भी तरीके से हुआ हो लेकिन पुलिस इससे खासी राहत महसूस कर रही है। वजह मुन्ना बजरंगी के जेल में मारे जाने के बाद से रंगदारी समेत दूसरे मामलों में दखल की खातिर रईस ने काशी का रूख किया था। कुछ वारदात को अंजाम देन ेकी प्लानिंग भी तैयार थी। पर्दे के पीछे से ‘सहयोग’ करने वाले भी तैयार थे। इन लोगों का मानना था कि काम भले कोई करे लेकिन ‘नाम’ उनका होगा। पुलिस इसे लेकर खासे दबाव में थी लेकिन रईस के सफाये से उसने राहत की सांस ली है।

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