बुलेटप्रूफ जैकेट से लेकर ‘वियाग्रा’ तक चाइना में बनती है पैंगोलिन से! अब जंगलों में भी कम दिखते

वाराणसी। पुलिस ही नहीं बल्कि आमजन के लिए पैंगोलिन एक जंगली प्राणी है लेकिन समूचे विश्व से यह खत्म होता जा रहा है। दरअसल इसकी खाल की दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में भारी डिमांड है। इसके परतदार खाल का इस्तेमाल शक्ति वर्धक दवाइयों, ड्रग्स, बुलेट प्रूफ जैकेट, कपड़े और सजावट के सामान के लिए किया जाता है। संख्या कम और ज्यादा डिमांड के चलते इसकी कीमत भी अच्छी मिलती है। बताया जाता है कि यौनशक्तिवर्धक समेत विभिन्न दवाओं और उपयोगी चीजों के लिए इसका उपयोग पुरातन काल से किया जाता रहा है। रुपयों के लालच में पैंगोलिन की तस्करी भी बढ़ गई है। जंगलों में इनका दिखना भी लगभग दुर्लभ ही है। इसे देखते हुए अब पैंगोलिन के संरक्षण के लिए दुनियाभर में प्रयास किये जा रहे हैं।

‘सल्लू सांप’ को सीधा करना नामु्मकिन

लाखों साल पहले लुप्त हो चुके ‘डाइनासोर’ का वंशज माने जाने वाले भारतीय पैंगोलिन भारत, श्रीलंका, नेपाल और भूटान में कई मैदानी व हलके पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। यह पैंगोलिन की आठ जातियों में से एक है जो संकटग्रस्त माना जाता है। दूसरी पैंगोलिन जाति की तरह यह भी समूह की बजाय अकेला रहना पसंद करता है। नर-मादा केवल प्रजनन के लिए ही मिलते हैं। इनके बिलों के मुंह भुरभुरी मिट्टी से ढके होते हैं जो लगभग छह मीटर तक लंबे होते हैं। पैंगोलिन के के दांत नहीं होते और इसका पिछला हिस्सा चपटाकार होता है। कभी-कभी वे पिछले पैरों पर खड़े हो जाते हैं। अपनी रक्षा के लिए पैंगोलिन बॉल की तरह होकर लुढ़कता है। इसकी मांसपेशियां इतनी मजबूत होती हैं कि लिपटे हुए पैंगोलिन को सीधा करना बड़ा कठिन होता है।

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